छबीली! मैने... सुना है!

मित्रों, एक शक्ति तो जरूर है, जो हम जीवों के प्रति मधुर दयालु है। उन्हीं पर चार लाइने आप पढ़ें, आनंद जरूर लें।

छबीली! 
मैने... सुना है! 
तुम! घूमती.. हो!  
बिल्कुल.. अकेली!  
सिवानों.., में निर-निचाटे; 
रात्रि प्रहर! 
क्या, सत्य है यह? 

नाचती.. 
बेलौस होकर...
अर्ध.. रात्रि, 
फसल.. ऊपर! 
मोटी मोटी बालियों.. 
के माथ पर।
क्या सत्य है यह? 

तुम! 
निर अकेली, 
बात करती, रात्रिभर..
उस, चंद्रिका.. संग! 
वह चांदनी जो.. 
दुखाती है
हृदय.. विरहम!  
अरु... 
नृत्य.. करती
अनुपम.., मनोरम..!
देवि किम! सत्यम इदम? 

क्या... है यह! 
नदी.. तीरे, पुलिन पर, 
तुम.. बिहरती हो.. 
उस दिवाने, 
बहते.. पवन संग!  
घन अंधेरी रात में..! 
देवि किम! सत्यम इदम? 

दूर... 
तुम..! 
उन पर्वतों..के, 
श्रृंग.. पर, धवलिमा!  
शैफाल सी फैली हुई, जो...
उनके... ऊपर, दौड़ती.. हो, 
लगाती हो छलांगें.. 
बेहिचक! 
तुषा.. 
से तुम, खेलती.. हो, रात्रिभर..! 
देवि किम! सत्यम इदम? 

इतना.. ही क्यों? 
बनान्तरों.. में, 
तुम.. मिली हो, केलि.. करती,
घन अंधेरे, 
शेर, भालू, पक्षियों.. संग! 
बिल्कुल!  अकेली..! 
देवि किम! सत्यम इदम? 

सखियों..
के संग! कभी चमकती हो, 
लप-लपाती...
आकाश की उन बिजलियों में,
कौंधती हो, क्रुद्ध होकर! 
बादलों और बदलियों से, 
मेल करती,  दीखती हो, 
बरसती, शीतल मधुर जल।
देवि किम! सत्यम इदम? 

देखा है तुमको, 
खेलती..  सुंदर बगीची.. 
पुष्प किसलय बीच, 
वन....
सौरभ बिखेरे,  महकती... 
पुन...
कील सी, कंटवासियों में, 
धूल में, लिपटी हुई,
अश्वथों के भाल पर, 
फुंगियों के पात पर! 
लह लह लहरती
फसलों के ऊपर
फ़हरती हो, 
मखमली, तुम चादरों सी, 
बिछलती,
अठखेल करती, 
नाचती.., 
नर्तकी क्या! नटिन... सी! 
फैले हुए, 
इस प्रकृति... प्रांगण.. 
के खुले...आकाश में।
हे! देवि किम! सत्यम इदम? 

छबीली! क्या.. है, ये...
सब...
मुक्त हो, हो.. 
मुखर! गाती, गीत.. तुम! 
केश.. बिखराए हुए, 
इन.., जोन्हरियों.. की बाल.. में,
बालियों में, महकती हो
किसके लिए, तुम! 
इस तरह, हो इठल करती 
खिल.. खिल.., हो खिलती.., 
हो.. हो.. प्रफुल्लित..!  
प्रातः खिले, इन पुष्प... में
मैं पूछता हूँ, क्या... है, ये...।

उतने.. ऊपर, पीपलों.. के, शिखर.. पर 
तुम, विहंसती हो, 
नटिन.. सी, नर्तकी बन, 
बालिका.. सी,
बादलों... से, चू.. रही हो, 
अमृत सदृश, इस धरा पर।

छबीली.. तुम! 
तुम बंधी हो, या... मुक्त हो,
हम सभी से, 
सृष्टि के इस कार्य में
मैं सोचता हूँ! अनवरत 
थक हार कर!  
फिर,.. फिर..  तुम्हे.. 
मैं सोचता! हूं,
कितनी मगन, कितनी खुशी 
तुम बांटती हो, इस धरा पर, 
बस हम सभी का जीवन चले, 
कल्याण प्रद, आनंद प्रद।
हे! देवि, किम! सत्यम इदम? 

जय प्रकाश मिश्र



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