सौंदर्य! प्रिय इस देश सा जग में नहीं!

मित्रों, अपने बारे में तो हमे जानना ही चाहिए इसी पर एक रूपक के साथ कुछ लाइने आप के लिए, पढ़ें और आनंद लें।

कितने...!
दिनों.. से सोचता हूँ! 
कौन... हूँ, मैं...?
पार्थिव... यह देह, प्रिय.. 
जो! 
दीखती...., 
हर.. नजर.. को,
क्या..! एक, सी.., है

बिल्कुल.. नहीं,
अलग.. कुछ, घर.. के लिए..
अलग.. हूँ, तेरे.. लिए! 
और!  सच.. सुनो,
बिल्कुल अलग, 
जग.. के 
लिए!
इस लिए ही, पूछता हूँ 
कौन, हूँ.. मैं? 

क्या पार्थिव से अलग... 
कुछ.. हूं..? 
आत्मा.. सा
अपार्थिव.... मैं! 
दृष्टि से, हर.. दूर हूँ, मैं..!
खोजता हूँ! 
कौन... हूँ! मैं...
पूछता हूँ! आप भी.. से, 
कोई, जानता हो, बता दे!
क्यों..., 
यहां.. हूँ! मैं...
इस धरा.. इस काल में, 
इस रूप में, मैं..
इतने... समय, तक.. के लिए! 
फिर.. शून्य हूँ मैं! 

कुछ! तो... होगा, 
जादुई... इस, नृत्य.. के, 
नेपथ्य... में,
चाहता.. हूँ! उठा.. दूं! 
जादुई... यह, 
यवनिका.., 
क्षितिज पर.. जो 
टंग रही है, 
हाथ से, मिलती... नहीं है
मिलती.. है, प्रिय! 
यह...
धरा..अपनी, 
घेरे.. हुए उस व्योम.. से, 
निर... अकेले... 
निर्जनों, एकांत में, सच! प्रलय पीछे।

क्या काल्पनिक! 
अनुभव करूं मैं... स्वयं को, 
'हूं... ही, नहीं.. मैं..'
सत्य में, कोई वस्तु, प्रिय! 
एक धोख हूँ, मस्तिष्क का,
कुछ भी नहीं मैं।

तो... सच! सुनो,
एक प्रिंस था, 
सलोना..! 
आप..
ही.. सा, सत्यप्रिय, प्रिय! 
सत्य.. उसका लक्ष्य था,
सत्य ही, छौना.. 
बिछौना...
सत्य ही था ओढ़ना।

पिता का वह, दुलरुवा!  
स्नेहिल.., प्रिये! 
विश्वासी... बहुत था।
पिता ने उसको सिखाया...
विश्व.. में, 
उस.. देश से 
सुंदर.. कहीं, कोइ देश.. न था..
उस देश से सुंदर कहीं..
प्रिंसेज न थीं
'उससे' बड़ा 'कोई दूसरा', ईश्वर न था! 

बालक था वह 'प्रिय सलोना!'
विश्वास था निज 'पिता' पर! 
पर एक दिन...
घोड़ा 
चढ़ा, बाहर गया.. संसार देखा...
चकित था, अभिभूत.. था,
कितना.. सुंदर देस.. था
सुंदरी.. 
अद्भुत.. लगीं,
प्रिंसेज, हृदय को छूने लगीं।

एक कोई संत था, बैठा हुआ, 
कौन हैं!  हे भद्र पूछा? 
ईश हूँ! 
सबसे बड़ा, 
मुझसे बड़ा कोई नहीं है! 
यह, सुन.. प्रिये! और देख.. कर!  
उसे, भ्रम.. हुआ, 
ये.. क्या 
हुआ
सब, 
उल्टा है.. सब, 
पिता ने, जो बताया..
विपरीत.. है, जग...।

विश्वास को, ठोकर.. लगी!  
आह! भर कर लौट आया,
बात की, जब.. 
पिता.. से
पिता.. बोला, भूल.. जा! 
जितना.. देखा था 
वहां! 
जादू था सब...!
जादूगर,.. वहां था 
उस देश में, कुछ सत्य न था।
सत्य है यह देश अपना
सुंदर यही है, 
सुंदरी... इस देश सी 
प्रिंसेज यहां सी, जग.. में नहीं हैं.!
मालिक हूँ, मैं...! 
राजा हूँ मैं इस देश... का! 
मुझसे बड़ा, कोई.. नहीं है।

स्थिति, 
सच.. बिकट! थी,
सत्य की, उसे खोज थी! 
वह फिर.. गया, घोड़ा... चढ़ा..
उस.. देश पहुंचा..
तुम! मजीशियन.. हो,  धूर्त.. हो! 
ईश.. न हो, कौन.. हो तुम! 
सच.. बता दो? 

उसने कहा,  मैं.. ईश... हूँ, 
सबसे बड़ा हूँ, देख न
संन्यासी हूँ मैं,
सत्य हूँ
सत्य, मेरा देश है,
जादूगर नहीं हूँ! 

मैने सुना है,
एक मज़ीशियन है
दूर प्रिय! उस.. देश में, 
वह यवनिका.., 
क्षितिज पर.. जो टंग रही है, 
हाथ से, मिलती... नहीं है
मिलती.. है, प्रिय! 
उस व्योम.. से,
धरा.. को, 
वहां ही निर... अकेले... 
निर्जनों में, मजिशियन का देश है
क्या तुम वहीं के हो...
अरे! वह तो काल्पनिक एक देश है।

सोचता है आज भी वह प्रिंस....
बिल्कुल हम सभी सा
कौन हूँ मैं.
कौन हूँ मैं..
सत्य क्या है, पिता है या ईश है यह! 
आज तक!  कन्फ्यूज है! 
और पूछता है.. 
मुझ ही जैसा कौन हूँ मैं।
कौन हूँ मैं। वही तो मैं प्रिंस हूं..
प्रिय.. सलोना! फिर पूछता हूँ, 
कौन.. हूँ, मैं..।
जय प्रकाश मिश्र

मित्रों अगर आपने यहां तक पढ़ा तो जरूर जाने की सत्य आप ही हैं। न यह लोक सत्य है न ही परलोक! यह जादू नगरी है जब आप जहां है दुनियां में जिस रूप में दुनियां का आनंद लें और मृत्यु पश्चात उस जादू नगरी में आनंद लें विदेह होकर डर कैसा और किससे! वह आप ही हैं जिसका पिता इन दोनों देशों का राजा है।
जय प्रकाश मिश्र









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