मां! अभी.. "बच्ची" हूँ मैं!
मित्रों, अबोले बच्चों का वह दुःख जिसके कारण हम मनुष्य ही हों, भीतर से हिला देता है, विचलित कर देता है और कुछ लिखने को मजबूर! न लिखे तड़प नहीं जाएगी, लिखने से भी क्या? उसको कोई अंतर नहीं पड़ेगा पर शायद मेरा दुख बह कर, कम हो जाय। जब किसी अबोले बच्चे के साथ, मेरी समझ से, मेरे देखने मेंअन्याय होता है तो कह नहीं सकता, विकल्पहीन हो वह केवल और केवल रोता है। जब वह आधे, आधे घंटों तक रोए, तो 'कांपता है कलेजा' और ये शब्द उसकी आवाज बन जांये, ईश्वर से विनती है। उनके पालनहार उन पर कृपा करें यह इच्छा है। जिम्मेदार अफसर और कर्मचारी तथा सरकार पर्यावरण को प्राथमिकता जरूर दे यह चाहना! मां! अभी.. "बच्ची" हूँ, मैं! मैं, चाहती हूँ, घूमना! बाहर कहीं, बस, कुछ समय ही! कितने दिनों से, सुन रही हूं, ए.क्यू.आई. बढ़ा है, शहर में, दीवाली.., के पहले.. से.. लगायत.. आज तक.. वही, बात! अब.. भी सुन रही हूँ, क्या करूं मैं? मां! अभी.. "बच्ची" हूँ मैं! मैं, चाहती हूँ घूमना! बाहर कहीं, ...