कुछ छोड़ जा, इन संतति के लिए भी।
मित्रों, पढ़ा था कहीं "लम्हों ने खाता की थी, सदियों ने सज़ा पाई" आज की लाइने इसी पर हैं। हम अपनों के लिए क्या छोड़ कर जाएंगे.. अब से कुछ अच्छा करें यही चाह है, आप पढ़ें और खुश भी हों इच्छा है।
अबोध..
प्रसवित..!
आज... का, शिशु..!
समोए.. है, युग..युगों को,
साथ अपने, देख तो!
सूक्ष्म में,
हर कोशिका,
हर अंग
में,
मस्तिष्क में,
जाने.. न, कितने,
पलकों... के, नीचे..,
मृदुल.. इस, सौंदर्य.. में।
मत, पूछ! मुझसे,
जन्म से,
एडवांस, है यह..!
अभी.. से,
थोड़ा..,
बड़ा.., होने तो दे,
देखना, हम सभी से।
चकित! मत हो,
जो मिला
है,
आज उसको,
तपस्या वह! परिश्रम वह!
त्याग.. है,
कामना.. शुभ की प्रिये!
जो कुछ किया था,
पुरुखों ने
उसके,
सच प्रिये! उसके लिए
वही तो, वह! आज है!
साफ.. जगहें, साफ.. पानी,
हवा.., कैसी..! मधुमयी!
स्वच्छ.. चित!
परिशांत..
परिसर!
पेड़ो
की
छाया.. शुभकरी!
आक्सीजन, प्रचुरता में
बह रही निर्मल नदी!
वातावरण!
अभिराम
यह!
घाटी.. सभी, फूलों भरी!
खिलखिलाती
हंसी वह,
जो
देखती हो आज तुम!
परिणाम है, सदियों का उन।
और
उनमें, फूल..!
कोमल, अहा सुंदर!
सखी, वह, खिलता हुआ!
स्वस्थ, सुंदर, तरोताजा, मरहवा..!
युवक.., बांका, अरी कैसे?
खींचता मन!
युवतियां तितली सरीखी
परियों सी उजली ,
चल रहीं या
उड़ रही,
अरी!
कैसी लग रहीं...?
संभावना! यह,
विश्व को, भी.. स्वर्ग देंगी।
और
एक्.. हम,
क्या.. ही, देंगे,
अपने, प्रियों... को?
बालकों को, पुत्रियों को!
आगे.. चलके, सोच न!
सोच कर, यह
सोच में
मैं..
पड़ गया हूँ!
इस, जहर मिश्रित प्रदूषण में,
हवा..भीतर, झाग बन,
बहते कणों में
दूषित ही,
क्यों
खत्म होते, जलस्तरों में।
एडल्टरेटेड,
बंद डिब्बा, भोजनों में,
प्रिजर्वेटिव.. से सने,
इन बिस्कुटों में।
फास्टफूडी व्यंजनों की चेन में,
खत्म होते.. बाग, वन
उपवन, ही क्यों,
विहग, खग
धन,
गोधनो के
संग, नदिया पोखरों में,
प्रपातों के रूप में, इन्हें क्या ही देंगे?
और अपने, गिरते हुए,
निज आचरण से,
सभ्यता,
प्रिय! संस्कृति,
यह छद्मयी! क्रूर सी,
स्वार्थ के भूखे हवस की, रूपसी!
और इनको क्या ही देंगे?
समय है, सब मिल करें
कुछ..
संकल्प लें, पूरा करे,
जो जहां है,
कठिन बन!
आदर्श का पालन करे।
चरमराते, देश को संबल सभी दें।
चरमराते, देश को संबल सभी दें।
जय प्रकाश मिश्र
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