श्रापित हैं हम! मानव है हम, स्वयं से।
मित्रों, बड़े शहरों के, भव्य आलीशान, राज महल से चमकते, गगनचुंबी, करोड़ों रुपए के कीमत वाले अपार्टमेंटों में रहने वालो के बच्चों के हॉल क्या हैं! इसी पर यह पंक्तियां प्रस्तुत हैं। वे बच्चे चिड़ियों, उड़ते बादलों, धूप, छाया और नीचे की सारी हरियाली के दृष्टिस्पर्श से भी दूर.., एकाकी जीवन की शुरुआत कर रहे हैं। उनमें स्पष्ट बिहेवियरल चेंज, जैसे चिड़चिड़ा होना, संवेदना की अति का शिकार होना, किसी को देख डर जाना, आवाज या मनाही करने पर रो देना आम हो रहा है। बाहर नीचे जाने के लिए उनमें तड़प है। पर एक सीमित और सुरक्षित दुनियां में अलग बंध गए है। आप पढ़ें और उनका संस्पर्श पाएं यही कामना है।
'बाहर चलोगी घूमने'
कह दिया, बस
मैने, यूं.. हीं,
देखकर
उसे
प्यार भर,
पुचकार कर!
जाने न क्या?
वह...!
समझ कर, अकन कर!
मेरी अंगभाषा,
वा प्रिए
वह.. शब्द! मेरे, पहन कर
चटका अरी हो
चहकती...
पंद्रह महीने के भी
अंदर, उम्र थी,
उस बालिका की,
कुमुदिनी हो, पूर्णिमा के चांद
का आभास पा..
खिलरी हुई,
गेंद सी, उछल.. पड़ी!
और वह!
सच.. दौड़ती,
गिरने से बचती,
लड़खड़ाती, भागती,
आ खड़ी
थी,
फ्लैट के उस गेट पर।
कितनी खुश थी!
फुदकती!
चिड़िया हो कोई!
पंख पा.. उड़ने को ही।
लाड़ली अकेली,
यद्यपि,
घर की, उस वह,
सांवरी.. थी।
और मैं,
अब..,
चुप! खड़ा था,
पास.. उसके,
मसोसता! दिल!
क्या करूं?
मुश्किल मेरी थी।
देखकर
'आई-होल' से
अंदर से बाहर, आश्वस्त हो,
खोल कर,
मुख-द्वार को आगे बढ़ा..
लिफ्ट लाबी, आ गया!
और वह!
कितनी गुलाबी हो गई!
मैं...
क्या कहूं!
शब्द फीके!
पड़ रहे सारे.. मेरे
कैसे लिखूं! इसे अक्षरों में।
बस यूं समझ!
गुब्बारे लिए, मैं.. खड़ा होऊं!
रंग बिरंगे,
छाते... में टंके, हर रंग के
बेचने को,
गरीब सच! कोई खरीद ले..
एक बस!
और..
और हो... बेचैन!
बच्चा! अंदर कहीं से
मुझे.. देखता, सोचता..
भाव.. क्या?
रखता है, अपने हृदय में!
बस एक् मिले..
कोई दिला दे
मेले में प्रिए, ऐसा लगा...।
और मैं
चुप खड़ा था की..
क्या करूं!
इस बालिका से क्या कहूं!
प्रदूषण है, विष है बाहर,
मारने को तुझे...
बच्ची!
नन्ही मुन्नी, फैला हुआ
आदमी के स्वार्थ
का...
घूस का,
अधिकारियों के गिरावट का,
बिल्डरों के लूट का,
हाथ में, सौदों का
हे, शिशु!
सरकार का, इन मंत्रियों का!
व्यवस्था का, आडंबरों के जाल का!
तूं... श्राप दे,
इन्हें... हृदय से,
कोढ़ी ही हों।।। ये।।।
इस जिंदगी में।
इसलिए
अंदर ही चल तूं..
श्रापित हैं हम! मानव है हम!
खुद ही, स्वयं से।
लौट आया, लिफ्ट लाबी छोड़कर!
फ्लैट अंदर, सोचता
जो....
क्या वही है
सोचता कोई और भी
बस पूछता हूँ... बताओ न!
साथ मिल कुछ बात कर तो।।।
इस हाल पर, हम! क्या करें।।।
जय प्रकाश मिश्र
मित्रों यह समस्या हर वर्ग के लिए है चाहे गरीब हो या अमीर, और इस पर अब कुछ होना ही चाहिए। बच्चों को बलि बंद करो।
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