वह कौन था?
मित्रों, जब भीतर का दीप जल उठता है, आत्मबोध की ओर हमारे कदम बढ़ते हैं, तो एक आमूल चूल परिवर्तन जीवन में घटित होता है। इसी पर यह लाइनें आपको प्रेषित हैं।
क्या..?
क्या... कहा..?
वह! एक, मिश्रण?
जी, नहीं...!
जी, नहीं...!
अब..
एक यौगिक..!
बन गया संसार संग..,
जुड़ गया, अंदर कहीं से;
घुल.. गया, इस सृष्टि.. में,
वह,
वह..., न! रहा...
आत्मविद!
आनंद ही अब, बच रहा,
स्वयं में.. ही खो गया।
वह बोध है अब!
लहरियां..! उत्ताल..!
उठती..
नाग सी फनकार करतीं
रात.. दिन
थीं सिर! पटकतीं
अब नहीं, शांत हैं, सब
जो प्रबल मन..! था,
सो.. गया.. अब..।
धूमिल! हुआ
अब..
स्रोत सारा... उर्मियों का...
रश्मियों का!
झूमता.., सिसकार! करता..
खेल करता... नाचता था,
चित्त.. बनता..
भरमता था.. चित्त जो....!
वह चित्त..! ही तो..
खो... गया...,
मन.. सो.. गया..! अब।
आज तो
वह,
बोध है बस!
संसार पूरा, घना सा..
अंधेरों... का
घेरे उसे...
उन बदलियों सा..!
फ़न उठाए..!
अब फ़न पटक कर
जमीं ऊपर, सो.. गया।
मत पूछ कैसे क्या हुआ?
एक अष्टावक्र! कोई..
राह चलता..
एक दिन!
उस
जनक को.. प्रिय मिल गया..
बोध उसको हो गया,
बस यही तो,
स्व "बोध" उसको हो गया।
जय प्रकाश मिश्र
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