यह उथल कैसी!

मित्रों, पूरा जीवन आप कितनी भी सफलता से जीएं, फिर भी, कभी कभी जीवन दौड़ में अचानक कुछ छूटता सा लगता है, पिछड़ रहा हूं! मन छनछना जाता है, एक उतावलापन भागता सा घेर लेता है। पुनश्च मन को समझाना पड़ता है कि नहीं यह संसार ऐसे ही है।  इसी पर ये लाइने आपको समर्पित करता हूँ।

यह, उथल..! कैसी..?
छटपटह टी! 
अंक.. 
भरती, पृथक.. री! 
विह्वली..! 
उतावली..! अंतर में मेरे.., 
इस उम्र तक उठ रहीं।

उतावली..! करती हमें, 
हम मानवों के 
मनों.. 
को, 
पिछड़ने की, 
अन्य से, परिवेश से,
चहुंओर.. अपने..
ऐसे है देती..
एक... छ्मकन..!
तप्त! कोई.. आयरन! 
हो छू गया... विश्रांत मन..!
बौना है करती.. 
यह, उथल..! कैसी..?

छोड़... देती, 
बस, 
कुछ क्षणों.. में,
सोचते ही, स्वस्थ..ता से...
संसार की गति, 
देख.. 
इसकी, प्रिय.. अधोगती..!
यह, उथल! कैसी..?

अचानक..!
कोई शोर सुन..! 
देखकर.. चमचम! चमाचम! 
यार की, किसी कार को,
मन ललच जाता, 
सोचकर 
साथ थे हम..
कुछ दिन ही पहले.. एक से..
मैं, रह.. गया,
यह क्यों 
हुआ..
यह, उथल! कैसी..? 
आज उठतीं, नाग..! सी.. ।

व्याकुल! है करती
रोक.. देती
नदी 
बहती.. 
विचारों की 
जीवनों के पठारों पर! 
अचानक! यह अरी कैसी ?
उथल! उठती ?

खींच..! है, 
ये 
अंदर.. कहीं.. की,
जरूरत! जिसकी नहीं, अब! 
पर लसलसाई.. जुड़ी है
हृद! तंतुओं से 
भविष्य के, 
उन 
तम्बुओं से...
अंटकी... कहीं! दुनियां..यवी 
रहने न देती.. बांध लेती,
चित्त सबका, घेर 
लेती
सांवली! उन बदलियों.. सी.. 
आग़ोश भरती, यह उथल.. कैसी?

संसार! 
पाकर! क्या.. करूंगा?
जिसे.. मिल गया है, 
दूर.. से, 
उसे.  
देखता हूँ! 
सोचता हूँ, बेकार! है, सब..
समय! उसको 
नहीं है,
मैं..
फिर... भी, फ्री... हूँ.., 
लेकिन मैं तुमसे, 
मित्र... 
सच! यह कह रहा हूँ, 
यह, उथल! कैसी? उठ रही! 
छट-पटह..की! 
विकल हमको और तुमको कर रही।

जय प्रकाश मिश्र





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