स्वरूपे.. अहम् अद्वये..!
मित्रों, अच्छी लाइने हैं, आपको भी अच्छी लगें चाहता हूं। जीवन और जीवन में सत्य पर ये शब्द! आपको कुछ दें तो मुझे भी अच्छा लगेगा।
एक भ्रांति! लेकर..
आज.. तक!
जीया...;
ये..
जीवन...!
"जग! मेरा... है,
और प्रियतम..! अहा.. सुंदर!"
सोचता और भोगता..
पा रहा हूँ...
मृत्यु के, मैं.., द्वार! आया..।
या कोई! है, रख गया...
कौन था? वह!
खोजता..
हूँ..
कोई! नहीं.. मुझे नजर आया।
देखता हूँ...! मुस्कुराता..!
सच! खड़ा.. है,
सिद्ध साधक!
सृष्टि से
संहार तक,
साध्य! को ही साधता, रह गया...
साधनों. में, गुम..!
हुआ.. पर..
सत्य की छाया न पाया!
जी! जी... वही..
सच..!
खड़ा... है, मेरे.. सामने
समय.. है, सब... रख है देता,
अवस्था को भांप कर..!
बिन कहे, और बिना मांगे..
अर्थ! इस संसार का।
संधान "सच" का "लक्ष्य" था
जीवन का मेरे..
खोजता..! इसे रह गया..
मैं जिंदगी में..।
पर मिला था,
मुझे...! कभी.. ये..
बस कुछ क्षणों में..
फूल की अद्भुत! खिली
उन क्यारियों में..
सुधि हरी!
उस चांदनी! की चंदनी! प्रिय महक! में..
केदार के, आकाश में,
उन गहर! गाढ़ी! नीलिमा..! में,
चमचम चमकती
चोटियों के
रजत स्वर्णिम शीर्ष में..,
मां के प्रिय,
उन झांझरों से आंचलों में,
प्रियतमा! आगोश में..
जब..
"मैं नहीं था" ,
सत्य में, मैं.. खो गया था
उन्हीं में, एक होकर, शून्य था मैं,
उस समय तो निरींद्रिय! था।
सत्य क्या है?
सत्य होना.., सत्य.. है
वही.. होना...जो.. देखते.. हैं..,
सत्य है,
पूर्णतः शून्य होना, स्वयं से ही
सत्य है।
नहीं होना, आपका ही
सत्य है,
एक होना.. पूर्णतः ही
सत्य है
सत्य है, यह जानना,
सब एक है,
अद्वैत है, जग...! सत्य है।
कोई कुछ कहे..
कण सभी हैं, कोशिका हैं, सूक्ष्म हैं..
और कण! परमाणु.., अणु हैं
इस प्रकृति.. के, धरा के..
रूप.. अपने, देह.. अपनी,
समन्वय..! हैं, इन्हीं के..।
बिखरे हुए अनुपात में..
यही कण तो
देह हैं, इन प्राणियों के..
और कुछ ये फूल हैं..! खिलखिले
संसार पूरा सामने..।
सत्य है,
सब एक हैं, अनेकता यह..
मात्र भ्रम! है।
इस लिए तो कहा है..
" स्वरूपे.. अहम् अद्वये..!"
जब हम स्वरूप में स्थित होते हैं तो..
सत्य में स्थित होते हैं और अनुभूति होती है कि, सब एक ही है, अलग कुछ नहीं, अद्वय है।
जय प्रकाश मिश्र
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