बात.. मित्रों पुरानी है,

मित्रों, सभी के जीवन में कभी न कभी  मधुर क्षण आते ही हैं। कभी तो यह मात्र छद्म आकर्षण होता है और कभी सच्चा प्रेम भी, इसे कैसे पहचाने इसी पर आज की रचना है। लंबी है पर पढ़ेंगे तो पढ़ते ही जाएंगे। जटिल है पर सरल भी है रस सरस है। कुछ लोगों के काम की भी हो ऐसी मेरी कामना है।

बात.. 

मित्रों पुरानी है, 

एक बाड़* थी, तटबंध.. था,

बचपन को घेरे, लेकिन विकल.. था, 

अंदर... कहीं, दरार थी, 

तैयार.. थी

अब.., टूट... जाऊं, 

छोड़, बचपन, 

पार 

जाऊं...! 

उम्र.. का, विहान था।


मन, 

मधुर...! 

कुछ.. खोजता,

अत्र-तत्त्रा* झांकता., 

अंदर कहीं, से चुलबुला..!

बाहर से.., बिल्कुल सौम्य! था।


वय-संधि*, मेरे.. सामने थी,

बढ़ा दूं पग, पार जाऊं!  

चाहती.... थी। 

ललक.. 

लेती, लहर!  

मुझ में, उठ... रही थी,

आकृति... इस, प्रकृति.. की, 

बदली हुई, सलोनी, मुझे लग रही थी।


मुझको... लगा, 

मुझमें कहीं 

कुछ.. रिक्ति थी,

वह पूर्ण होना, मांगती थी


आज कुछ... बदलाव था, 

मन.... मेरा ही, क्यों.. 

कहूं! 

फ़िज़ाँ में, फैलाव था....

हवा जैसे फागुनी! कुछ कह रही हो

मुझसे अकेले

एकांत में, 

मुझे... कुछ, ऐसा लगा।


कोई आ... रहा था, दूर... से

गाता हुआ.. 

गीत... मन का

मगर, चुप...! चुप!

एक छांव सा, नीलिमा भर, अंक में

मुझे घेरता था! 


सांवले! घन, केशु उसके.. 

सुगंधित.. तन 

मुझे, कैसे! छू रहे थे, 

मुझको लगा, 

मैं किसी आगोश में था।

पाश में, 

आबद्ध.. मै, अब हो चुका था,

अचानक! जाने न क्यों, ऐसा... लगा।


यह शांति.. न थी, 

स्नेह न था, 

प्रेम तो, बिल्कुल नहीं था,

मात्र यह अधिकार था,

मन पर मेरे..!

हे प्रिये 

उसका, मुझे...तो ऐसा लगा।


परीक्षा की घड़ी थी

मन कांपता था, 

छाया घनी थी, 

स्थिर खड़ी थी, अकंपित..

भेदती थी... दृष्टि अंतर 

शांत मैं, यह सोचता था।


स्वतंत्रता सबसे बड़ी है, 

अपरवश होना दुखी है

परिवेश में एक गति हुई

सम्मोहिति...

मुझको... हृदय तक

मैं.. डर गया! 


अब.., नेत्र में, बदलाव.. था, 

बदला.. छुपा था..,  

रक्त में..

हारने का, भाव था,

मैं चुप खड़ा, 

युद्ध, 

उस छाया से, प्रिय अब! लड़ रहा था।


मैने कहा, 

तुम!  शक्ति.. हो! 

विनाश! फिर क्यों, कर रही हो? 

करुणामयी! 

नियंत्रण... में, तुम रहो तो 

विश्व का कल्याण हो, 

रक्ष क्या, 

मुक्ति.. क्या, प्रेम.. सबमें बांटती हो,

संसार की गति, अधोगति तो तुम्हीं हो!   


दास है, यह जग तुम्हारा..!

जगज्जननी 

तुम्हीं हो।

छाया ही थी, गुणगान सुन, 

वह छंट गई, खुश हुई और 

हे प्रिए वह घर गई।


लेकिन नहीं, 

वह दर्प! थी, रूप! थी

राजसी थी, सृष्ठु तन थी, पुष्ट मन थी

नवयौवना, सच मदभरी थी।


अब दूर है वह, 

जंगलों में, 

एक कुटी.. है,

साधना है, प्रेम की, करनी उसे

पर क्या कहूं!  मन.. राँधती 

वह!  

बांधती है, भावना को 

सम्मोहना.. में, लगी... है।


"मन पढ़ सके, 

बात सच्ची रख सके, 

प्रेम निर्मल कर सके 

यह साधना थी" ।


पर बात आगे बढ़ चुकी है

नियंत्रण उसे चाहिए, सबके हिये पर..!

इसलिए, क्षमतामयी वह 

दृश्य को 

उत्पन्न करती, बदलती है।


आकर्षण वृथा का बुन रही

फंदे सुखद वह 

चुन रही, 

निर्मम! प्रकृति की

व्यर्थ के सुख दे रही 

झांस में वह फांसती प्रेम पांसे 

फेंकती है बांधती है

मन सभी का

ज्ञान से उस दूर करती ।


जो रोकता

दासत्व से है व्यक्ति को

वह जानती है, 

बोझ जितना बड़ा होगा 

चाहना का, भावना का 

मन वहीं कमजोर होगा 


वहीं मेरा दास होगा।

प्रेम तो प्रिय मुक्त है, 

शासन करे यह प्रिय जनों पर

संभव नहीं है, नियंत्रण मन पर करे यह।


दासत्व का दासा छुए मतलब नहीं है।

एक सुषमा नील रंगी

ले घूमती यह,

बेचैन करती है मनों को

वेग देती, 

अनावश्यक रूपसी यह।


दबी हो, कुचली हुईं इच्छा कहीं

यह खोजती है, कुचाली,

मत छुओ निर्मल मनों को

वय संधि के इस पार आएं

तब झपटना, फाड़ खाना

छोड़ दो, बच्चे अभी हैं

सोचता हूँ, 

पर क्या कहूं, जो देखता हूँ

इसलिए ही कह रहा हूँ

दबाओ मत, इसे समझो

इच्छा है ये, बलवती है

पर, बदलती है

एक क्षण में

समझ से,

तोड़ो नहीं, 

स्वीकार कर लो, 

फिर बदल पाओगे, तुम मन! 


उसने पूछा प्रेम से

क्या है मन! 

छाया है, जग की, 

तुम पर पड़ी

और क्या मन! 

मार सकते तुम नहीं, 

तोड़ सकते तुम नहीं

पार कैसे पाओगे, स्वांस इसमें है नहीं।


इसलिए स्वीकार कर लो

एक क्षण को,

बालकों की जिद है ये,

फिर अलग होकर तुम जियो।

प्रिय यही है मन, यही है मन! 


उसने पूछा 

कामनाएं क्या हैं प्रिय! 

चाह इतनी प्रबल है, क्यूँ.... 

कौन है, मनोज! वह

जो घेरता है, अकेले में। 

त्रस्त करता

आचरण से, क्या है ये? 


उत्सव है प्रिय! 

यह सभी कुछ! 

शक्ति का, उस शक्ति से

आत्म का उस आत्मा से

मिलन है, आनन्द पथ है

पर यदि समझ भी साथ हो।


शरीर तो एक द्रव्य है, 

लकड़ा छकड़ है, माध्यम है 

मात्र यह, 

आनंद तो प्रिय अलग है

विषय है किसी और का, 

जो उच्च है।

अविकार है, वासना से रहित है

भय रहित, अमरत्व है।


जय प्रकाश मिश्र

एक बाड़* थी: परिवारी जन, मां पिता                          आदि की निगाह

अत्र-तत्त्रा*: आस पास इधर उधर

वय-संधि*: लड़कपन से किशोर या यंग                    अवस्था की तरफ

टूटते तटबंध के समय का।


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