पटाक्षेप:

कृपा हो आचार्य श्री! की,
अनुग्रह! हो, देवता का,
पिता श्री! की 
प्रसन्नता..
थोड़ी
और
ले.. लो 
मां चरन रज! 
इन में, मिला.. लो.
सब.., तुम्हे.. मिल जाएगा।

बिना मांगे मां! ही देगी..
वह जानती है,
भेद 
तेरा....
प्रसन्न जननी...! 
क्या.. नहीं, देगी.. तुम्हे ?
सोच से, भी अति परे... 
वरदान देगी ,
सोच न! 
तूं... फूल है, उस डाल का।

पटाक्षेप: 


बदलते! इस जमाने.. में, 
एक थी, मेरी.. 
चिरैया!  
पाल.. रखा था, उसे,
अरमान.. से..।
 
रोज.. बुनता, 
ख्वाब  मैं.. था..
अहा सुंदर! 
सपनों में.. अपने
रंग भरता, लालसा का, 
छुटपने से।


तंतु..! ले.. ले..
प्यार.. का 
छूता.. था, उसको,
दूर.. से, 
उसे.. देखता था, प्यार ले..।

नजर की छाया में रखा 
सदा उसको, 
भूल जाता, 
खुद को था, मैं.. साथ.. उसके।

कौन सा वह एंगिल था,
देखा नहीं था,
जहां.. 
से..
हर कमी, 
मैं.., पूरता था 
सदा उसकी.. दिल लगा के, 
बिना सोचे! 

और उसकी मुस्कुराहट!  
मंत्र..! थी, मेरे लिए
मैं..
बिखर जाता.. 
फर्श पर.. सच मोतियों सा, 
पारा ही समझो, 
बिदक जाता, विकट चंचल..
नाचता था, मिट्टियों पर..
बिना सोचे! 

सुना है 
वह... उड़ गई है.. 
आज प्रातः
बिना बोले..! बिना बोले!
शब्द एक.. इस.. आसमां में..
मुक्त हो, हर बंधनों से..
कुछ लगा है,
कहीं अंदर.. ठेंस सा, 
कुतुरता है मन मेरा.. 
हृदय को..।

ठेंस लगती थी मुझे,
तब गांव में..
इन पैर में.. दुःख कहां था?
खेलता था, गिल्ली डंडा, 
चकवा चकई, कबड्डी..मैं  बिन डरे..!

पर आज तो, यह.. लग गई! 
अंदर कहीं!  
ठेंस 
गहरी..
घायल मुझे है कर गई!
मुझे लग रहा है,
चिरैया! अकेले में, 
मौन.. हो, 
घायल से कुछ है, कह रही..! 

जय प्रकाश मिश्र

Comments

Popular posts from this blog

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

एक घंटा बिताते हो पार्लर... में,

बावरे ये नयन तेरे, शिकारी हैं!