जिंदा रहा वो जब तलक

मित्रों, जीवन के कुछ अनुभव शब्दों में आपको प्रस्तुत हैं आप पढ़ें और आनंद पाएं।

जीवन ये क्या है, अपूर्णता... है, 
क्या! इस लिए.. उस पूर्णता की 
प्राप्ति.. में, खोज.. में
हर... गति यहां है।

क्या इसलिए? 
बस इसलिए!  
जीवन यहां, गतिमान.. है।
त्रस्त.. है, 
यह, समस्या.. से, 
दुख.. भरा, इतना.. बड़ा!
विषाद का वितान.. है! 

पूर्णता का 
क्या करेगा, हाय यह! 
इसको बता दो, 
पूर्णता तो, अगति* है;
गति* ही नहीं, उसकी कोई! 
शांति.. है 
वह, मृत्यु.. ही है,
चांदनी नहिं, अमावस की रात है।

यह रस.. विपुल, रस विविधता!  
संसार.. की, उसमें नहीं है। 
वह, एक रस है,
प्रवाह उसमें नहीं है, 
उत् तेजना, तेज, रज, तम
छोड़, उसमे, सत भी नहीं है।

छोड़ उसकी दौड़, खुश रह! 
अपूर्णता में, 
जीवन यही.. है,
आनंद है, सुख है यहां 
इस बिपन्नता में, याद रख! 
मोड अपना रास्ता, 
रास्ता वह पूर्णता का गलत है।

जो नहीं है, पास तेरे, चाह उसकी
ललच है, यह ललक है
इतनी लगी..!
किस तरह, सबको लगी? 
यह ललच ही तो, जिंदगी है, 
जी अभी,
उप प्राप्ति में कुछ भी नहीं.. 
कुछ भी नहीं! 
जहां पर तूं जा रहा, पहुंचना तूं चाहता है
अशांति है वह, निराशा है,
इससे बढ़ कर कुछ नहीं।

है जहां पर पूर्णता, 
हर चीज की
मनुष्यता...! तिल भर नहीं है,
मनुष्यता तिल भर नहीं!
वो मशीन हैं, आदमी हैं ही नहीं!
दूर रह तूं उन सभी से..
जिंदगी जी, 
जिंदगी तेरे यहां ही..
आज भी है नाचती।

पग दो

जिंदा रहा वो जब तलक
सबने निभाई यारियां
सब एक थे, 
यार थे,
फ़िदा थे एक दूसरे पर जान दे।

जिस दिन मरा वो सड़क पर
बारिश बहुत थी*
खुदा के इस कुफ्र से, सब दूर थे
उसी दिन से, कहते सुना, 
मुझे माफ.. करना ऐ खुदा! 
मेरा यार था वो, इस तरह 
आज क्यूँ था बरसना।

कह यही, 
घरों में बैठे रहे.. सब, मौज से
और वह काली सड़क पे..
पिस रहा है, आज भी, 
ठीक.. वैसे।

जय प्रकाश मिश्र






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