वह..! नदी यह है नहीं..।
मित्रों आज नदियों को देख रोना आता है, इसी पर ये लाइने आपके लिए।
अरे! यह....
वह..!
नद.... ही.. नहीं..,
किताबों... में...जिसे
मैने थी.. पढ़ी..,
किनारे! साफ..., सुंदर..!
निर्मल..है, जल,
सतत.., शीतल.., सुखद. अविरल
विशद..., है जलराशि बहती,
ठुमकती, हो इठल करती,
इस तरह वह आगे.. बढ़ती.
अरे! यह.... वह..! नद.... ही.. नहीं..।
लहरें उठती, अरी.. उसमें,
देख.. उसको, सच में, मुझमें!
उर्मियां फंस उर्रिल होतीं!
पृष्ठ ऊपर, नदी के,
वे लहरती, मचलती..
अरे! यह..,
वह.. नदी! है.. ही नहीं..।
पेड़.., जिसके किनारों पर,
घने, छाया भरे तरुवर!
अंक में ले, इन
सभी को
हवाओं से, पट उघड़ते
अंग, मोटे.. छिपाती वह.
धार से हरदम पलटती...,
अरे! यह.. वह..! नद.. ही.. नहीं..।
चिड़ियाँ! उन्हीं बन छांव में
चूं चूं चहकती...
मछलियां, सब तैर तरती,
उछलती..
गीत.. गाती, सभी धारें..
उमड़तीं,।।।।
अरे! यह..,
वह..! नदी है... ही, नहीं..।
बंधुआ... मजदूरन है!
कोई...
हाथ, बांधे
सामने, चुपचाप डर डर यह खड़ी।
अरे! यह..!
वह..! नदी है ही, नहीं..।
शहरी नालों को ये ओढ़े,
बूढ़ी हो कोई!
चल रही
गंध उनकी समाए..
अंग अंग छुपाए!
मजबूर... कैसे,
कितनी प्रदूषित, हाय! दूषित
अरे! यह.., वह..! नदी
किताबों... में, जो.. थी पढ़ी है ही नहीं।
अरी!
यह... तो,
बंधे तन, बंधे मन
देख न! कैसी विवशतम!
रास्ते पर, एक ही,
बांधी हुई, रोकी गई
हर, ढाल पे, एक ही गति चाल में
सदा बहती, बंधी बांधों,
रेगुलेटरों के बीच से निकलती।
रंही पुती है किनारों पर
किसी पतुरिया सी,
प्रेमिका है क्या किसी की?
यह नदी, वह नही...
जो किताबों में थी पढ़ी..
बंधुआ... मजदूरन है,
कूड़ा ढोती शहर की।
जय प्रकाश मिश्र
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