मत भून मुझको, पैन में,

मित्रों, आज की स्थिति पर यह एक कॉकटेल रचना है। साथ ही मेरे अंतर्मन के उद्गार भी हैं, अच्छे लगे तो आखिरी तक पढ़े अन्यथा...।

मत भून मुझको, पैन में,
चिल्ला रहे ...
कुछ..
यूं... 
चने...! 
उछल.. कर! 
स्किन हों फटते..!
चटक कर, दो टूक होते..।

मैं.. 
निकल जाऊं 
कैसे...  बाहर.. इस 
झुलसती... आग... से,
पर, कोशिशों में, 
फेल होकर
पैन में, 
हर.. बार गिरते..!
गर्म.. उन ही 
सर्फ़ेसों
पे... 
पैर..., 
जिन पर नहीं, थमते..!
नहीं रुकते, एक... क्षण! 
आज देखा! 
आदमी 
को! 
सच कह रहा हूं! 
कुछ इस तरह से, स्वप्न.. में।

चने... जैसे, 
पैन में ही उछलते! 
लाइनों से.. फट रहे थे, 
मिसाइल की नोक पर, 
रखे हुए उस 
लोड.. 
से..
बारूद था या न्यूक्लियर! 
जांच इसकी छोड़ दे..
उस बॉम्ब्स को.. फटते हुए! 
देखा है मैने, चित्र में,
लाल गुब्बारा 
हो.. कोई!
बहुत ऊंचा.. धधकता! 
ईश्वर करे, यह सच न! हो! 

जो है इकठ्ठा, हो.. रहा,
सामान.   सारा, 
हे प्रभो! 
वह न! फटे!!!
वह न! फटे!!!

अरे, हे..! 
आज... के हनुमान!  
कोई.. तो.. बनो,
जाओ.. उड़ेले!  
आज लंका में, घुसो...
पर क्या कहूं! 
कनक सी वह चमकती... 
लंका...! जली थी, 
एक दिन!
रावणी वह बुद्धि थी, अहंकारी! 
कहां समझी!  
बात सारी... 
बिन कराए नाश! 
और विध्वंश पूरा...
जब.. बुद्धि मारी जा चुकी हो,
कोई.. भी, रुकता 
न हो!
तो क्या कहूं? 
रावण था तब, 
दुर्योधन... था तब!
आज यह....है, ट्रंप.. अब!
चल छोड़ इसको..
बात.. गहरे! की.. समझ!

जीवन भी क्या है, जादुई पट!  
श्याम दिखता, इस.. 
तरफ! 
तो...
श्वेत.. होता 
उससे... ज्यादा! उस.. तरफ! 
पर.., अंदर.., कहीं.. 
होता.. है 
यह..! 
दिखता.. नहीं, 
हमें..एक संग, बाहर च भीतर..।

जब एक 
हो.., 
तो.. यज्ञ.. 
होता.., संसार बनता..,
कार्य में यह, बदलता है.. 
क्षणों में..!
पर...
किसी...,  का.. भी..., 
हर.... समय 
यह 'एक'
हो, 
एक सा, ऐसा न होता।

द्वैत! 
प्रिय.. यह, 
जिंदगी का मर्म है, 
सदा से... है
यही.. 'भ्रम..' है..., 
इससे बुनी यह जिंदगी.! 
जिसे ढो... रहे, 
मिल... हम सभी
आज तक! 
भ्रम में ही, यह... चल रही।

एक भ्रम! ईरान को है,
एक भ्रम! इजराइल को है,
एक ही है, अमेरिका को!
हाल-ए-जहां.. 
तब..है, यह...!
सोच तो,
एक भ्रम पर! स्थिति यह...!
और..., 
भ्रमों का पंडाल! यह जग! 

भ्रम हि.. था, 
तब रूस को.. यूक्रेन.. से, 
नाटो को लेकर! 
भ्रम ही है, इजरैल का ईरान पर
उस न्यूक्लियर पर! 
आज है जो चाइना को 
कोरिया.... से...
और आगे, इंडिया को, मूर्खों से..
कैसे कटे भ्रमजाल यह! 
प्रश्न  है यह..!

सफाई 
हममें नहीं है, 
चिंता.. जनों की, 
आम जन की, सरल जन की
एक को, इनमें नहीं है,
सच कहूं! व्यापार है 'जड़' 
होड है, मैं मुख्य.. हूँ 
और सच है, लूट है सब! 

एक.. 
सच कहूं! 
संघर्ष है यह, 
आंतरिक! मन.. बुद्धि.. संग, 
तौल... सारीकाल्पनिक!
पर... लड़ रहा जग! 

हर भावना तुलती यहां, 
फिर भागती.. है! 
बदलती 
है,
छाया तो उसकी, श्याम रंग, 
वह कहां? रंग..! 
बदलती है,
फिर, 
सोच।  में, 
यह.... दुखी होता, 
सुखी होता, दोष देता,
व्यवस्था, विधि 
विधानों को
एक दिन
बूढ़ा 
है, होता... 
उधेड़ बुन में, सदा जीता,
अंत में जब शिथिल होता
अपरवश बिस्तर पे पड़ता! 
यथार्थ का दर्शन है होता।

अब, रंग सारे उड़ चुके हैं
पंजरियाँ हैं, कांपतीं 
सत्य निर्मल
सामने है,
पर 
दृष्टि....
धूमिल हो चुकी।

बायरन... को छोड़ कर, यह..
डिकेंस, अब है पढ़ रहा,
देखता है, घृणा! से 
इस विश्व को, 
मतलबी
थे
लोग सारे, 
अंतर्व्यथित.. है,
चकित है, अचंभित है।

लो, 
उभर आई, आत्मा अब!  
सामने से पूछती है! 
क्या है ये 
सब? 
प्रेम हूँ! मैं, क्या करूं, 
कैसे रहूं! इस घृणा के संग! 
फफक कर, सच!  
रो... रहा..
सिसकता, अव्यक्त अब
अस्पष्ट सा व्हिसपर है देता!
अंदर कहीं, से अहकता, 
सोचता है: 
अर्थ दुनियां का, प्रिए वह खोलता!
प्रकाश हूँ, मैं! प्रेम हूँ! 
हर घृणा से 
दूर हूँ 
मैं..
अंश हूँ, परमात्मा का
देह में, बस आज हूँ मैं.। 
देह में, बस आज हूँ मैं.। 

दिन तुम्हारा आएगा, 
हे ट्रंप सुन लो! 
नेतन्याहू भी सुन लो,
ख़ामनेई और प्यारे पुतिन? सुन लो,
जिनपिंग ही क्यों.. 
जेलेंस्की....
किम! तुम भी ये सुन लो..
शेष सारे पापियों..!  
तुम सभी सुन लो..
बिस्तरों पर, बैठ कर..
सिर पकड़ कर
पाप की
इन..
सड़ांध में तुम! 
बैठ कर दिन गिनोगे,
प्रार्थना... 
पर प्रार्थना तुम नित करोगे
हे प्रभु मुझे, मुक्ति दे दो।
हे प्रभू, अब, मुक्ति दे दो।

तैर जाएंगी यही तस्वीर!  
तुम सब सामने...
रोती..
बिलखती..
कांपती, धुओं में जलती!
और कहती.... 
सोच लो मैं क्यों कहूँ कोई गंदगी! 
तेरे लिए...
पर 
एक कोई सच में होगा!  
जो कहेगा 
हे विधाता, क्षमा कर दे..
आदमी मिट्टी के हैं ये,
प्लीस इनको मिट्टी ही कर दे।

बारूद की! 
इन मिट्टियों.. में 
दम तुम्हारा फिर भी घुटेगा! 
फिर भी घुटेगा, 
सड़ांध से, पाप के तूं! 
नालियों की ईंट ही, हर जन्म होगा।

जय प्रकाश मिश्र

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