खोल दें बस हृदय अपना उतरने दें सत्य को

मित्रों, हममें एक चेतना कहें या अस्तित्व जो सारे प्राणियों में एक ही है बहता है। ये लाइने आप को वहां तक ले जायें यही कामना है। 

चाहता हूं!  खोल दो तुम! 

हृदय.. अपना,

एक बार बस.., मेरे.. कहे! 

उतरने.. दो, सत्य!  

उसमें.. 

धीमे..., धीमे.., और धीमे.., 

पूरब.. दिशा से 

उठ रहा, सूरज.. हो जैसे।


धीमी.. करें, 

थोड़ा और... धीमी..! 

अरी.. यह.. उत्तेजना..! 

इन सुख., दुःखो की 

लालसा.. की,

उद्विग्नता को... 

शांत कर... 

राख को.., नीचे.. रखें!


मेरे कहे..! 

कुछ.. देर.. बस! 

परे हों.. 

घुमड़ते हर विचारों.. से, 

स्वार्थ.. के, परमार्थ के, 

हर तरह के..

अब 

शांत.. हों, परिशांत हों

कुछ देर...बैठें, भीतर ही अपने।


खाली करें, यह हृदय अपना,

हर भावना से दूर... हों,

क्या मुक्त हैं?  

अब..

शून्य है, सब! 

मात्र बस, अस्तित्व हैं, अब..!


अस्तित्व किसका?  

आप हैं, 

अब..

ध्यान.. दें..

क्या.. मात्र अपने? 

अन्यथा... 

बहते.. हुए 

अस्तित्व नद के, भाग हैं।


नहीं! 

यह... तो, 

सभी का अस्तित्व है, 

सागर हो जैसे बह.. रहा..! 

एक सा... एक.. पटल, पर...!

अस्तित्व मेरा..! कहां है, 

मैं.. कौन हूँ?  

सकल 

जग तो, एक है, 

हर किसी में, सभी.. में..., 

अस्तित्व.. सबका?  

एक.. है! 


अलग तन से, अलग मन से, 

अलग है, यह... सर्व से

और हम..

उसके लिए, अब

नेह.. 

भर.. स्नेह भर..

मौन.. में, ओंकार.. चढ़! 

आमंत्रण करें...! 


वह सुन रहा है..

चल.. चुका है, बैठा.. हुआ है, 

पास तेरे...

भावना इसकी करें..! 


साथ हो, 

तुम पिता के, हर जन्म के 

इस लिए अब अभय हों।


रास्ता एक और भी है, 

शॉर्ट.. है,

धनुष लें.. ओंकार.. की,

बाण रखें,

निज चेतना का, आत्मा कह!  

अस्तित्व कह! 

जो कुछ भी कह...!

और खींच...! पीछे...

छोड़ दें, उसे.. बिंदु रूपी, शून्य में

उस ब्रह्म पर...

और विचर उसमें, 

बस डूब उसमें, डूब उसमें।

खोज.. खुद को.. 

मिलोगे तुम यहीं.. खुद से।

जय प्रकाश मिश्र

 


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