एक चिड़िया उत्स की भीतर कहीं है बोलती।

मित्रों, जीवन क्या है! इसी पर ये पंक्तियां आपको छू दें, अंदर कहीं से.. बस और क्या मुझे चाहिए इन लाइनों से। आप पढ़ें।

जीवन! भी.. क्या है..;
सोचता.. हूँ 
बैठकर... 
इन.. पत्थरों पर! 

उभरे.. हुए, 
खुद! 
देख न! 
इस जमीं.. ऊपर!  

पैरों.. के, नीचे.. 
रईसों! के..
नेता.. बने, 
इन दिग्गजों के पड़े कैसे? 

बिना.. बोले.. 
चुप.. क्यों कहूँ! 
सब मौन.. हैं! 
ये आम जन हैं आज के..
जीवन... भी क्या है, सोचता.. हूँ!

जीवन भी क्या है? 
गुन.. रहा हूँ!
इतने.. दिनों से..
बैठकर! 
 
अमराइयों की, छांव..! में
देखता कुछ दूर पर, 
पेड़ों के नीचे, 
सूखी हुई, इस जमीं ऊपर! 

उघड़ी.. हुई, 
कराहती.., प्यासी.. पड़ी
इनकी जड़ों.. को,
देखकर..! 
लगता है मुझको..
ये.. हड्डियां.. हों, 
निकली.. पड़ी, 
मेहनतकसो के शरीरों पर...!

चेहरों पे.. उनके...
खुरदरी.. बे छाल की, 
बे मांस की, अटपटी सी..
उसने कहा? 
जी 
नहीं...! 
उससे भी बदतर! 
जीवन भी क्या है, सोचता.. हूँ! 

जीवन भी क्या.. है?
कोई.. 
पुलिंदा...है! 
बज़न.. है! यह रीछ..! का..
बढ़ता हुआ, 
कुछ शरीरों का.. घड़ियाल.. सा! 
पर सच यही है,
यह भार है,
हम सभी ऊपर....।

कैसे करूं कम! 
कवायद.. है.. 
इसी.. 
की.., 
या 
शाम.. की! रंगीन.. सी!
उन दावतों में 
शरीक 
हूँ! बस यही तक! 

किस शौक का 
खुमार 
है 
यह..? 
फेहरिस्त लंबी बहुत है..
कितना कहूँ?  
जीवन नहीं.., जीवनों का सार है यह! 

क्या..? 
चाहते.. हैं, देखना..! 
वह.. चेतना! जीवन है जो..? 
जो जागती है, उत्स है, 
इन जीवनों में? 
गा.. रही है, 
गीत.. 
वह! 
अंदर ही तेरे..!
सुन उसे..।

आ.. 
चला, आ.. 
तूं... पास मेरे, 
छोड़ इस संसार को, 
कुछ... पल तो अपने..! 
साथ हो।

एक जगह है, तेरे ही भीतर! 
शांति की, आ बैठ जा..!
रख... दे, वहीं..
लादा हुआ,
संसार..
सारा
वहीं.. नीचे!
हल्का..तो हो ले.., 
हल्का..भी हो ले.., तब बैठ नीचे।

कहां.. था, तूं..? 
इतने दिनों 
तक! 
वह.. पूछता है? 
ध्यान दे! 
यह "घर"  तेरा है, 
अपना ही घर तूं मान इसको।

यह संसार न.., है! 
बाहर है "वह..!"  
यह सुरक्षित.. है
निश्चिंत..
रह! 

संसार ही क्या दीखता है, 
मात्र तुमको!
मिथ्या है वह!  
वह 
बदलता हर एक क्षण  है,
स्थाई नहीं है, 
व्यापार है, वह ध्यान रख! 

तैर उसमें, डूब मत! 
कुछ नहीं तुझे चाहिए..
दो.. रोटी के सिवा!
इतनी कवायद किसलिए? 
यह.. याद रख! 

शेष सारा...
नदी मेरी, हवा मेरी, जगह मेरी, 
छांव मेरी, पुष्प मेरे, फल भी मेरे! 
तूं भी मेरा, उन्हीं जैसा... 
याद रख,
अब निकल बाहर, मौज कर।

जय प्रकाश मिश्र


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