याद कर तूं भी, निमंत्रण!

कथानक: आज समृद्ध और अपने समय के समर्थ, ही नहीं मध्यम आय वर्ग के साथ अल्प आय वर्ग के भी वृद्ध और यंग लोग शहरों में एकाकीपन और उदासी से बीमार च अवसाद ग्रस्त हो रहे हैं। अतिविकसित जगहों पर तो लोग समाज नाम की अवधारणा से दूर हो चुके हैं। केवल अपना और नितांत अपना जीवन जी रहे हैं। कैसे इस उदासी से पार पाएं इसी पर कुछ लाइने आपके आनंदार्थ प्रस्तुत हैं।

चल.., 
आज थोड़ा.. 
निकल..! बाहर..! 
इन घरों.. से, समय.. से, 
तूं.. सैर कर.., 
पैदल.. पथों पर.. 
पार्क में या सड़क पर, 
थोड़ा.. और, पहले.., सबेरे, 
दिनकर निकल, आंगन में आएं, 
यदि हो सके 
तो, उनसे पहले।


अन्यथा, उगते.. समय भी।
जानता हूँ, जानते हो!
बहुत छोटी चीज है, 
यह..
पर, विश्वास कर, 
नाम..लेगा, यार! मेरा, विश्वास है! 
टहलने के बाद, सच तूं।

आ निकल बाहर! 
यहां... पर..
आज! 
हम, 
मिल.. देखते हैं, 
आकाश यह, अन्तर्प्रभासित!  
किस तरह, आभामयी!  
इतनी सुबह! 

बितान कोई 
तना 
हो,
चमकता..., नीलाभ.. सुंदर! 
अपने ऊपर! 
अनोखा.. विद्युतिमयी.. 
कुतू..हली
महसूस कर, बहती.... हवा
छूने.. तुझे,  है दौड़ती...
कैसे आगे, तेज चल!  
जरा, 
हरा... इसको, पकड़ कर! 

झुंड...! उड़ता.., 
फाख्ता.. का, स्याह.. सा, 
देख तो, 
यह! 
कितना, खुश.. है, 
मचलता, करतब दिखाता, 
कितना! चुटुल... है। 
बात कर, 
नमस्ते कर, कोई....! भी.. हो! 
क्या... हुआ, 
अपना बना तूं!  आज उसको..
अरे किसी.. को तो..।

जोड़ों में, उड़ती.. 
इतनीं, चिड़िया, दूर तक... 
देख न! किसके घरों तक..।
तैरती...! नभ सरोवर में, 
परों... पर,
देख.. तो,
यह जिंदगी..., उड़ती भी है, 
आ.. इसे, अनुभूत कर।
चल आज थोड़ा... बाहर निकल ।

शाम को, मत बैठ भीतर..
अकेले.., 
बाहर निकल! 
डूबता सूरज, बिखेरे लालिमा..! 
सुरमई प्रिय रंग की, किस? 
देख इसको, 
ध्यान से, 
रंगीन... बादल! 
बनाते तस्वीर किसकी! 
परख इसको! 

अब, डिम हुआ है, 
सूर्य वह, तेरी तरह,
पराक्रम कर, थक.. गया है..
अब जा रहा, नेपथ्य में.
निमंत्रण है रात्रि का.. ।

इस रात उसको... 
देख कैसे..
शाम..! सिंदूरी.. हुई है, 
लाल साड़ी में, वो.. सज कर! 
मेहनती सूरज को ले,
बाहों में अपने,
अंधेरों में, दीप.. रखती, 
द्वार.. पर, तारों के इन,
प्यार ले,
रुखसत.. हुई है।

याद.. कर, तूं भी, निमंत्रण! 
याद.. कर! 
इस ही तरह की, शाम का.. 
मिलन का, 
उन कहकहों का, प्रेम का
चल.., आज थोड़ा.. 
मेरे कहे, बाहर..निकल..!   
सैर कर.., पैदल पथों पर, सैर कर।

जय प्रकाश मिश्र

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