लंगूर की पूछें हों थोडी और लंबी...

मित्रों, जीवन से हारे हुए लोगों में, एकाकी और अवसाद में जा रहे लोगों के लिए सूक्ष्मशक्ति और नवउत्स भरने के लिए एक छोटा सा प्रयास मेरा इन लाइनों से है। नेचर की वनस्पतियों और जंतुओं में जीवन-प्राण देने की जादुई शक्ति है, आज शहरी जीवन में इससे दूर लोगों को समर्पित ये लाइने आप भी पढ़े।

बस 
पूछता.. हूँ! 
बता.. न!  कुछ.! छुपा.. न, 
सच.. बता.. दे! सब बता.. दे,
आज की ये.., शाम.. 
तेरी.., 
इस तरह से, 
सुस्त...! क्यों.. है? 

मटमैली.. है, इतनी..! 
दीवार... पर,
इन.. 
दीवटों पर, देहरी.. पर
एक..! दीपक... तक नहीं है।

यह, शाम!  है, 
या... 
खुदकुशी...! 
अंधेरों.. संग अरी! तेरी,
कुछ बोल न! 
मुझ, प्रकाश...! की, 
तूं... छोड़,
उस... 'किरन' की
किसी 'रौशनी'... की, 
तनिक! भी 
चाहत!  
बची...., 
तुममें.... नहीं है।

क्या हुआ? 
हे, मित्र... मेरे! 
तूं... इस तरह! नाराज़... क्यों है? 
आज, सबसे...'दूर' क्यों... है? 

चल दूर कर, तन्हाई... उदासी!  
छोड़... ये सब..
आ! 
यहां.. आ...
मेरे.. साथ, मिल..! 
निजात... पा, इस डूबने... से
अंतर्मनों... की नदी में, 
बहते.. हुए,
इन विचारों के, द्वंद्व... से।

इसलिए!  
कुछ बातकर! 
पुरानी बेहतर थीं, मुझसे।
आ... 
करें... कुछ, 
इस! बंद खिड़की से सही.. 
शीशे... के पीछे, 
वह भागता... 
कम.. से कम, अपना नहीं, 
तो.... 
न सही...! 
दूसरों का, खिल रहा, 
लहरता...., उपवन... तो देखें!  

खिलता है, 
कैसे? 
देख... न! 
फुलझड़ी  की, शेप... लेकर, 
संसार यह! 
फूल सा, 
पलकों में उठता, 
लजा जाता.. फिर संभालता,
पंखुड़ि के रंग लेकर! 

मुस्कुराता...
गुलाबी..., 
हल्का... सा पीला, 
और फिर
झिलमिली.., तारों.. भरी 
हो छुईमुई.. , किसी नज़्म.. सी
सुरमई रंगों में 
फबती.. 
तेरी तरह!  बेफिक्र होकर! 

आ.. 
दीप! दो...
हम तुम, जलाएं, 
दीवार के बाहर, हम रखें..,
थोड़ा उन्जाला,  
मिलजुल 
करें,
यह... उंजाला, सबको... मिले, 
जो इधर देखे, बेवजह... भी
प्यास उसकी.. भी, बुझे..! 

चल.., 
तन्हा उदासी दूर कर 
अरे! नीजात... पा, इससे अभी तूं

चल 
एक पौधा, 
लगा दें, हंसता हुआ
फूल... जिसमें, हो... लगा, 
किसी.. के
चेहरे सा खिलता!  
रंगत... सलोनी! देख उसकी 
एक बार तूं, हंस! दे जरा।
इस फूल की, कंट्रास्ट सी! 
हरीली, 
इन पत्तियों में, 
देखकर! अधखिली कलियां लगीं
मुस्कुरा, एक बार तूं! 
खिल जाएंगी ये, 
खिलखिला 
के।
दरवाजे, के अंदर.. चौखट के ऊपर 
खिड़की के बाहर, 
पटनियो पर..
रख, इसे...
देख.. 
उनको...
गुजरते.. हैं, इधर... से जो... 
देखते हैं, प्यार से, तेरे फूल.. को
चुलबुले हम तुम, 
कभी तो हो सकें..
चल.., इस तन्हा उदासी से अभी
निजात... पाएं, दूर हों, 
कुछ तो करें।।
चल, एक मिट्टी का ही सही...
सारस खरीदें, लंबा.. ऊंचा , 
सफेद! झक! हो, 
रंग... इसका,
बरामदे में, बांध... छत से  
बिठाएं, 
इसे... धनुष डोरी...
टांग कर,
झूला झुला दें, ऊपर से नीचे...।
लान में, नकली सही.. 
गिलहरियां! सजाएं एक.. दो... 
किसी, पेड़... नीचे,
और कुछ चिड़िया खरीदें 
रंग बिरंगी! 
खटकती, लंगूर की पूछें हों 
थोडी और लंबी... 
देखें इन्हें खुशियां मनाएं
चल.., अभी.. तन्हा उदासी छोड़ कर
बहती हवा के, पंख पकड़ें साथ मिल
हम भाग जाएं.., दूर.... पेड़ों पर वहां! 
उधम... मचाएं।

जय प्रकाश मिश्र

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