सुना है, ए.आई. है आया मित्र जग में।
मित्रों प्रश्न है! क्या ए.आई. भविष्य में, शोषित सर्वहारा वर्ग और शोषक वर्ग के बीच तीसरा प्रतिमान बन कर उभरेगा। क्योंकि एक तरह, यह बुद्धिजीवी वर्ग का स्थान ले रहा है, और उसके महंगे श्रम को श्रमिक के श्रम के बराबर ला रहा है। आज की लाइने इसी पर बेस्ड हैं आप पढ़ आनंद पाएं यही कामना है।
मनु..
पुत्र.. तेरी,
देखकर, हर..
छद्म-नी चालाकियां..,
हदों... तक, बेई..मानियां..
किमिया..गिरी,
पेचीदगी..,
गांव,
शहरों से जुडी,
पर्दा हटा,
पहचान कर!
भेड़ियो की खाल में,
अब भी छुपा.. है,.. आदमी..!
मन.. भर गया,
इससे ज्यादा, क्या कहूं?
इसलिए,
अब! चाहता.. हूँ,
खत.. लिखूं, और...,
खत.. में.., सच..., लिखूं!
पर,
जानता हूँ, पाती.. मेरी!
तुम! पढ़ो...! संभव नहीं !
अक्षरों से भेंट, तेरी
आज तक! एक, भी.. नहीं।
तो..
क्या करूं?
सोचता... हूँ!
पास आकर..., पास... तेरे,
बात..,
मुंह से.., सब कहूँ!
बता दूं...,
देख..! 'दुनियां'
छलावा! है,
व्यापार है, अब!
तेरा, मेरा,
और
इनकी बुद्धि का,
मात्र.. बस!
इसलिए! अब सजग रह! तूं।
समझता है,
अरे..., क्या तूं?
बात किसकी हो रही है?
जानता हूँ, क्षुधा से, बीमारियों से
भुखमरी के ताप से,
व्याकुल है
तूं!
गर्म है, सिर.. तुम्हारा,
जल.. रहा है,
प्यासे.. हो तुम!
और बच्चे.., तप रहे,
तवे से, गर्मी में इस!
जल! नहीं तुम्हें मिल रहा है,
आज भी, प्यास से,
प्रताड़ना से,
इस समय, आतुर तूं!
हाल मेरी भी यही है,
प्रकृति! मैं..
हूँ!
देख न!
उस लान में,
बस दिखाने को..
बेचने को जगह यह,
प्लाट.. यह, प्रोजेक्ट में उस..
गुल.. खिले हैं,
गुलगुले से गुच्छ में!
हरित! सुंदर! कालीन हो,
फैला हुआ, फ्रेश! तरीना!
स्वच्छ निर्मल अहा! कैसा...
चाइना की घास है,
कुछ इस तरह!
और मैं..
बाहर यहीं कुछ दूर पर
फैली पड़ी,
दूर... तक,
झुलस कर, पीली पड़ी हूँ,
सांस अंतिम गिन रही हूं।
इन सभी के करतबों से,
भूमि में,
पानी नहीं है,
आक्सीजन! बात मत कर!
सांस ले आराम से,
इनको.. नहीं है।
बात मेरी छोड़ दे तूं।
पर्यावरण
पार है
अब, पांच सौ.. से
दमा की..., दम निकलती
बाल शिशु.. की
भविष्य.. की, खुद की..
इन्हें..
एक भी चिंता नहीं है।
पागल हुए ये, बेचते हैं फ्लैट
अब आकाश पर..
ऊंचाई पर.
बादलों में, दिखाते हैं
ब्रोशरों में, दस...
करोडी,
जान की चिंता प्रिए इनको नहीं है।
आधार हैं, हम, तुम ही इनके,
समूचे व्यापार के,
अन्यथा ये,
कुछ नहीं,
बेचेंगे किसको, आलसी
लूटते हैं श्रम हमारा,
पेश करते हैं
तुम्हें,
लान में, क्यारियों में
सड़कों किनारे श्रव्श में
बदल देते, मन सभी का
एक क्षण में,
लूटते हैं,
हर किसी को
दिखा कर गुलगुले से गुल खिले
प्रोजेक्ट में।
सुना है,
ए.आई. है आया
मित्र जग में,
कर रहा है, छुट्टियां,
अब बुध्दिबल की,
धराशायी अगर होंगे..
शीर्ष के..
ये लाडले..
दूरियां शायद हों कम
शोषकों और शोषणों के बीच की।
श्रम किसी का हो,
बराबर हो
घंटों... में नपे,
पैसे सभी को, एक से
बर्लिन* शहर से ही.. मिलें।
अंतर सभी के, पारिश्रमिक में
थोड़ा ही, कम हो,
बिचौलियों को, सजा हो,
जब्ती भी हो,
सटोरियों का नाश हो
और सट्टा बंद हो।
स्वस्थ हो हर, व्यवस्था,
स्वस्थ अपने नागरिक
डिस्क्रिमिनेशन
आदमी में एक न हो।
संरक्षण सदा,
इस इस प्रकृति का हो,
प्रकृति का दोहन न हो।
जय प्रकाश मिश्र
* बर्लिन या कहें जर्मनी में श्रमिक और व्यवस्थापक की तनख़ाह लगभग बराबर ही होती है।
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