तुम अतीन्द्रिय हो, असीमित हो मित्र मेरे।
मित्रों, संपूर्ण विश्व, अनादि शक्ति से परिचालित है, यह शक्ति, संपूर्ण ग्रह नक्षत्रों सहित हमें और इस प्रकृति को एक साथ जन्म-मरण के रूप में गतिमान रखतीं हैं। इस शक्ति ने मनुष्य को अतीन्द्रिय प्राणी बनाया है, हर आत्मा को उसका शरीर, ईश्वरीय वरदान है। मनुष्यों ने अपनी को सोच को सीमित क्यों कर रखा है? इसी पर यह लाइनें।
कौन लेगा,
गोद में, तेरे... सिवा,
इस सृष्टि का आधार, है.. तूं..!
कैसे कहूं!
जो कुछ भी हूं,
जन्म से, ले मृत्यु तक!
मां! तेरा..
प्रसाद..मैं हूं,
हम सभी: में,
देह की मिट्टी ही क्यों,
"प्राण" है तूं!
कौन.. कहता है की..
तुम!
हे.., मानवों!
सीमित! यहां हो,
इंद्रियों तक!
मित्र! तुम.. हो,
अतीन्द्रिय! अपरिमित!
आनंद! लहरी, परा.. विस्तृत!
लहरती.., इस प्रकृति के तो,
पुत्र.. हो तुम।
देख.. तो,
क्या.. देखते हो, मात्र.. तुम!
इन
नेत्र से...
जादू! नहीं देखा कभी!
जादू! नहीं देखा कभी!
इन नेत्र का,
फिरकियों से घूमते है,
लोग इन पर,
हवाओं
फिरकियों से घूमते है,
लोग इन पर,
हवाओं
से
फिसलते... हैं,
फिसलते... हैं,
कनखियों के इशारों.. पर,
उम्र भर, अरे, कैसे..! लोग.. कितने!
एक...
लहरा.., ओस का,
शांति का, संतोष का
घेर लेता है.. हमे..,
आगोश में,
बस एक क्षण में।
जब
प्यार.. से, तुम्हें...
कोई.. बूढ़ा..,
पराया, अपना प्रिये!
हाथ रखता, स्नेह से,
सिर पे अपने..।
खुशी देता, स्पर्श यह..
अनुभूति! यह,
अरे!
क्या.. है
क्यों, बताओ न?
आत्मा, अंदर कहीं से
हुलस.. कर, मगन.. होकर,
अहा.. कैसे
लपेट लेती है, उन क्षणों में
आनंद भर भर, हम सभी को!
इसलिए तो कह रहा हूँ,
अतीन्द्रिय तूं।
अपरिमित तूं, वरद है तूं।
सोच.. तो, एक बार
हो, आशीष.... देता,
संत कोई!
स्पर्श
कर दे, मस्तकों पर,
चंदन लगा दे, ललाटों पर!
प्रेम से और, स्नेह भर भर।
दो शब्द कह दे,
चरण...
छू लेते, हो तुम!
नत हुए किस प्यार से।
और.. वह
आशीष.. दे दे,
मन कामना से पूर्ण हो !
सुन इसे, आनंद में, तुम
झूमते हो
तुम अतीन्द्रिय हो, हे मित्र मेरे, मित्र मेरे।
बिना पाए, बिना खाए, एक कण
तुम रीझते हो, पुष्प पर,
सौंदर्य पर
तुम तरसते हो,
देखकर!
इसे
ललचते हो,
इसलिए, तुम अतीन्द्रिय हो।
कभी
पास जाओ,
खिल खिलाते, हंसते हुए फूले हुए,
किसी पेड़ के, संसर्ग में
कलियों को देखो,
खुशी लेकर।
नि:स्वार्थ ही, देखकर
तुम मुरझ जाते
प्यास से
मरती.. हुई,
लटकती,
उन पत्तियों को देखकर।
इस लिए तुम अतीन्द्रिय हो।
आनंद कैसे, तुम्हें देता,
रूप! खिलता
पुष्प.. का,
दूर से...,
तुम बिना.. छूए..
देखकर,
बस...अरे! कैसे..
किलकिलाते,
अज्ञान बच्चे, प्रफुल्लित मन!
कूदते नन्हे हों बच्चे खेलते!
अचानक बिन बात के
अच्छा है लगता,
तुम्हे भी
देखकर अरे यह सब किसलिए!
अरे! तुम अतीन्द्रिय हो, इसलिए।
अरे! तुम अतीन्द्रिय हो, इसलिए।
जय प्रकाश मिश्र
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