एक भ्रम है जिंदगी.. आखीर तक,

मित्रों आज के वैश्विक हालात पर कुछ लाइने आपके लिए प्रेषित हैं, पढ़ें और खुद हों।

प्रश्न.. खुद से, होने.. लगें, जब..;
स्थिति.. है, दुखद..! मित्रों, 
शिकायत! किससे करें?
जब! खुद ही हारें! 
जानकर.. 
हम!
उम्मीद..
तब, किससे.. करें हम?

प्रश्न.. खुद से? स्थिति है, सुखद! मित्रों,
देख,.. न! कोई.. जागता है! 
अभी.. तेरा, अंतरों में,
टोंकता.. है,
कम.. से 
कम! 
तुझे! रास्तों को छोड़, इन.., 
किन! रास्तों.. पर, तूं... चले? 

अंतर कहीं है, दिख रहा? 
स्थिति तो, एक ही है! 
कोई पॉजिटिव 
है सोचता..
और..
कोई.. निगेटिव.. है।

इस 
निगेटिव!  
और... पॉजिटिव! 
के बीच में, एक चेतना.. 
संवेदना.., चैतन्य.. है,
यह, स्फटिक मणि
परा.. निर्मल, 
पारदर्शी
मुक्त 
है।

पर, तन की छाया, 
मन की छाया,
और यह 
प्रतिबिंब जग का, 
इंद्रियों का 
भास.. 
इसको छेड़ता है।
अन्यथा! यह 'स्व' 
स्वरूपा.... 
चिर... सुखी है।

कौन है यह? बताता हूँ! 
स्व.. तुम्हारा! 
आत्म.. है,
दीखता.. है, ध्यान में,
तुम रमण करते, हो इसी में..
यह, एक निष्क्रिय..
सजगता...! 
जागृति, भरपूर ऊर्जित! 
चेतना में स्थिति... है।
यह.. स्थिति, ही.. ध्यान है, 
अरि! सहज सुख है।
जिंदगी का।
पर, यहां..., यह..!
पर...., 
की बातों.. में, दुखी.. है! 

देख न! 
कितने दिनों से, सोचता.. हूं,
उम्र...में इस, 
कुछ..! मिसिंग है।
कुछ... छूट कर है जा रहा, 
मेरे हाथ.. 
से.. 
अरे! मेरा.. 
अरे...! वह.. छलनामयी.. मरीचिका.. कह! 
धूप होती, छांव देती, बदलती तूं सुरसिका.., कह! 
कुछ भी कह...
वह! 
छूटती ही जा... रही है,
दूर... 
प्रिय, मैं देखता हूं! 
यद्यपि मैं, 
तृप्ति से ऊपर बहुत हूँ।

पर, अचानक! 
देखकर! 
भागते.. इस विश्व को
आज तक, 
इस खत्म होती उम्र में,
मैं व्यथित हूँ! 

बस सोच कर 
लोग, लूटे.. जा रहे हैं, 
रात.. दिन..! 
कुतूहल भर, भागते..हैं, 
श्रमसार... होते...
सच में कितने,
क्या... है, 
ये..! 
यही 'ये' अंजान मुझसे 
आज... 
छूटा जा रहा है, भ्रम है 'ये'
मैं... जानता हूँ
एक तृष्णा
अधूरी 
है, 
यह जिंदगी, एक की ना...
सभी की है, 
इस अतृप्ता वासना पर तुली है।

और..,  एक मैं..., बिचारा! 
बैठा हुआ बस, 
किनारे 
पर
जिंदगी की शाम में,
देखता हूँ! भ्रमित! जैसे.. मूढ़ हूँ।

लोग हैं, लपेटते.. ही, 
जा.. रहे , 
संसार.. 
की, 
इन रज... भरी 
राजसी, वैभवी.. संपत्ति चादर! 
रे.. प्रिये, 
निज.. तनों ऊपर, 
क्या? बिना सोचे! 
पागल.. हुए !
या और 
कुछ...
है...
इन्हीं में.. कुछ!  त्रसित! हैं
जरूरत... को, तरसते... 
साथ... उनके, 
ही.. 
लगे.. हैं,
एक ही व्यापार में, 
रातदिन प्रिय! 
पर, एक दूसरे को कोसते हैं! 

और... बपुरा! एक मैं, बैठा हुआ...
इस... एक.. कोने! 
चुहुंक जाता हूँ, 
अचानक! 
स्वर.. 
से इनके..।
सोचता...क्या....?
छूटता.. है जा रहा? 
हाथ... से मेरे, अरे! 
सत्य.. में, 
या.. झूठ है यह!
इस उम्र में कर्तव्य! मेरा 
क्या अभी भी, शेष.. है! 

फिर अचानक मैं सोचता हूँ 
क्या...
अभागा.., 
मैं.... यहां? 
श्रम चोर, वंचित!  
मात्र हूँ! इस... जगत में, 
बैठा... हुआ, इस 
किनारे पर, इस तरह, 
अपराध खुद ही
जानकर
मैं 
कर रहा हूँ।

विडंबना है, क्या कहूं! संसार यह! 
स्थिति क्लीयर नहीं है।।
एक भ्रम है जिंदगी.. 
आखिरी तक,
स्थिति क्लीयर नहीं है।।

ध्यान की उस नाव से, 
जब उतरता हूँ,
यहां.. नीचे ,
कब तक
रहूंगा 
वहां ऊंचे...!
देखता हूं लोग हैं, 
संसार... है, जलता हुआ,
संत्रास में, सब लोग है, 
अरे! कैसे, जी.. रहे? 
पाप पापी, कुछ नहीं!
ईरान में जो मर रहे,
इजराइल में जो, झुलसे हुए
चिल्ला रहे, 
आदमी है, क्या अरे! 'ये'...
और मैं, 
समाधि में, कैसे रहूं! 
तूं बोल मुझसे? 

विडंबना है, क्या कहूं! संसार यह! 
स्थिति क्लीयर नहीं है।।
एक भ्रम है जिंदगी.. 
आखीर तक,
स्थिति.. क्लीयर नहीं है।।

जब देखता हूँ, पिघलता हूँ! 
वहां भीतर, उबलता हूँ, 
क्या है 'ये'
कोई बता दे, 
कहीं से एकबार मुझको।

जय प्रकाश मिश्र




 

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