अब यवनिका उठने को थी।

सांसारिक नृत्य करने, आत्मा, इस धरा पर उतरने के पूर्व अपना उत्कृष्ट रूप ले, शरीर बन, सौंदर्य भर गर्भ से निकलने को तैयार खड़ी है अर्थात यवनिका उठने को है। इस समय, इस आत्मा रूपी नायिका का दृश्य कैसा था! इसी पर ये लाइनें आपमें आनंद भरें यही लालसा है।

सांसारिक नृत्य करने, 
आत्मा खुद, 
धरा ऊपर, उतरने, अब जा रही है 
अंतिम घड़ी है, आतुर खड़ी है 
यवनिका उठने को है. 
पूर्व उसके, 
वहां पर क्या दृश्य है:  

अरि! 
नरम पद, 
कैसे थे, उस के..? 
कैसे.. कहूं! 
बिह्वल.. अभी.. हूं! 

और... 
गहरी..., 
दृष्टि उसकी, 
किस.. तरह, हर.. ले गई, मन! 
परा.. विस्तृत...! 
दूर तक, चितवनि! थी उसकी।
 
मधुमय.., मनोरम.. 
सौम्यता... 
ही, खड़ी हो,  मूर्ति बन..।
और..
क्या कहूं! 
हर वृत्तियों... से, क्षीण 
अनुपम...।
शांत.. स्थिर!  
नील उत्पल, सरोवर में, 
खिल चुका हो, बिकच.. कच भर
बिकस कर, रूप खुद, सौंदर्य भर भर
आकृति कुछ इस तरह थी।

संपूर्णता... में, 
पूर्ण.. 
प्रमुदित! 
प्रसन्ना... तन! 
एक् जादुई! आलोक में हो 
बिछलती,.. रवि की किरन 
आभा लिए.. वह 
परम अद्भुत! प्रतिष्ठित! 
कोई रख रहा हो, प्रथम..पग
इस तरह बढ़ रही वह! 
मेरी तरफ,।।।

विश्व, सारा..., उतर आया 
हो... स्वयं ही
तैरता.. 
उन कोवकों, में,
सजल!  चंचल! 
चमकते... 
कांचाभ ऊपर, 
काले... पटल, पर….
एक पल में,
प्रत्येक पल, नय.. नवल झरतीं 
'रिदम' करतीं, समीरन..
और क्या कहूं.. सुषमा थी उसकी।


आंखे... थी उसकी, 
खींचतीं..., 
सैलाब..., मन का,
जस.., ज्वार आगे बढ़ रहा हो 
भागता, प्रिय समुंदर.. का।

पीछे... 
अपने... पटक देता, 
मछलियां हो..
हे! प्रिए, निर्मम!  तटों... पर
सच इस तरह
एक क्षण में, छोड़तीं... वह 
मोह...
पिछला, 
नया... ले, आगोश भरतीं..
चल रही थी, बांधती और छोड़ती मन।


जिस तरफ वह देखती।
अग्नि.. हों, वे.. 
यज्ञ.. की
पावन परम, 
दृश्य धुलतीं, रंग भरतीं, 
शांति देकर
शांत करतीं, चित सभी का
जगमग बनातीं,
प्रकाश भरतीं, प्रतिबिंबित..थी करतीं, 
लय विलय कर क्षणों में, आलाप भरती।

किस.. तरह? 
जादू.. भरे थे नैन, उसके,
जादुई! 
प्रिय, नील! आंखे, 
रंग.. सुरमई.. 
खड़ी  थी, वह वहां पर
हीरक कणों के बीच में आभामयी! 
जल बीचि प्रिय हो उछलती उल्लास में! 
पुखराज ना, नीलम मणि 
अरि! अनुपम मयी।

बादल..से
उड़ते... केश, उसके, सांवले.. 
कारी बंदरियां, उड़ रही थीं.., हवा में..
चंदवक.. मुख पर हो, 
छाया सीपियों की, रजत मयि!  
कुछ इस तरह तैयार वह प्रिय आत्मा थी।

लहरता, इंदीवर! हो जैसे 
उषा पटो पर, 
प्रात में
झील ऊपर, हिलदुलाता
नत मुखी
पग रख रही, 
प्रिय! हिलक कर! वह आत्मा
ममतामयी! 
शांत मध्यम, निष्कलुष 
निर्झरणी हो बहती
कलकली  
ले अरे वह बह चली
धरा पर आ... गिरने से पहले
गोद में वह आ गई, अब निष्ठुरी! 

जय प्रकाश मिश्र

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