बता न! कौन.. है, तूं..!
मित्रों, जीवन की पूर्णता क्या है, इसे एक लहर के रूपक में रखता हूं। जीवन ऐसे तो शून्य से शून्य की यात्रा है, फिर भी है, और वास्तविक महसूस किया जाता है इस लिए आप यह लाइने पढ़ सकते हैं। अंत में शायद कुछ काम का आपको मिले।
बता न!
कौन.. है, तूं..!
और किसलिए,
पास.. तेरे,..
आएं! यें.. लहरें..
उछलती, इस जोश से
और क्यूँ..?
मन हृदय के द्वार, तेरे..,
पाथर पटे, इन तटों पर,
पटक दें!
सिर माथ अपना,
समंदर के, किनारों पर!
इस तरह..
मस्तिष्क में, न्यूरॉन बन कर
घूमती फिरती रहें!
बता न! कौन है, तूं?
तरंगें यह क्यों उठें?
बार.. इतनी
बार.. कितनी,
पास तेरे, चढ़.. उतरती
सागरों के, वक्ष से
गर्त.. श्रृंगों.. में सिमटती
दूरी.. से उतनी,
इतनी, दूर... चल के!
बता न! कौन... है तूं?
गिर पड़ें,
चरणों...पे, झुक कर,
विसर्जन कर, समर्पण कर!
अरे! ऐसे...
और तूं.. दुत्कार, इनको...
बता न! किसलिए!
अरे! कौन है तूं?
समय है यह, मात्र तेरा
स्लॉट भर है,
जिंदगी में, कुछ ही दिन का
ध्यान रख तूं!
फिर नहीं आएंगी लहरें!
तुझसे कहने,
शब्द कोई.. तरंगिर सा।
और
फिर ये,
दूर ही विलीन होकर
क्षितिज में, तिरती रहेंगी
पास तेरे, मित्र मेरे, फिर न होंगीं।
क्या है कहती, लहर! तेरी
समझ इसको, सूक्ष्म है! ये।
जब है उठती, ज्वार बनती,
और ऊपर तनतनाती और तनतीं।
शक्ति, तेरे आत्म में, वह भर.. रही हैं
जीवन यही है, कह रही है।
प्रोत्साहित कर रही है,
जो उत्स भर दे,
प्राण में, वह
पॉजिटिव
है, कह
रही
है।
विश्वास भर, आशा लिए,
शांति चादर ओढ कर
प्रेम अंचल में भरे
सरस, सरला
करुण कैसी
सुख दुखों
में सम
है
रहती,
संतोष से,
लय विलय होती
पग नया धरती, प्रेरणा ले
ईश से, शक्ति पा परमात्मा की
तरंगित हो, आनंद लहरी, झूमती
आज में, वह जी रही है।
कठिन होगा, तट वहां
उस किनारे पर,
जानती है,
शुष्क
ही
पाषाण होंगे, रेत होगी,
निगेटिव ही लोग होंगे
विष भरे ही जीव होंगे
स्वागत नहीं उसका करेंगे।
सब जानती हैं।
फिर भी लहर है,
धर्म.. अपना जानती. है,
घृणा.. उनसे, न.. करेगी
प्रेम से, उन्हें..'नमी' देगी
क्षमा करना, सिखा कर..
प्रेम.. का, प्रतिदान देगी
शांत रह, विश्वास.. देगी..
लौट कर सागर मिलेगी
और अपने घर चलेगी
यही तो है, जिंदगी!
और क्या थी जिंदगी।
जय प्रकाश मिश्र
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