'किनक' बोली..! वह किशोरी..।

मित्रों, हम मानव अपने आवाज और काव्य की मिठास को कितना भी महान कह लें, पर प्रकृति की वास्तविक मिठास हम मानव से कहीं अधिक होती है, इसे चिड़ियों की कूंज और सरिता के प्रवहित निनादित स्वर में हम सुन सकते हैं। इसी पर यह लाइनें आपकी प्रसन्नता के लिए समर्पित हैं। और उन बेजुबान पशु पक्षियों की आत्माओं को भी समान समर्पित है, जो आज खाड़ी युद्ध में मारे गए या अपनों से बेघर होंगे।

सूर.. के पद! श्री कृष्ण... दर्शन! 
अद्भुत.. भजन! 
मिष्ठान्न सम,
आनंद, अनुपम..! 
एक क्षण में, डुबा.. देते, 
बाल लीला, की रसीली...
 
सुरसरी में,
रसभरी, उस धार में..
आज भी, आकंठ मुझको।

क्षणों... में, 
यह...
भिगो.. देते, 
मानस पटल को, हमारे 
साथ.. अपने..!  
मिला देते, बाल मन के 
तोतले! मधुरतम! स्वभाव में।

मीठे बहुत है, सूर के पद! 
रस घोल देते कर्ण में,
श्रीकृष्ण वैभव,
रस अहा! 
अमृत! 
परसते.. शब्द में

सोच कैसा मृदुल होगा,
भाव... उनका, 
रस.. भरा
जब, ब्रह्म.. ही हो, बंध.. गया 
बालक स्वरूपा, पाश.. में।
और... फिर. 
नाचता... हो, निपट.. प्रेमी! 
ग्वालिनों के (ताल) पे।

पर मिठाई! है आज खाई! 
चिड़िया.. है, देखी..
किशोरी...!
क्या...! 
बोल.. बोली..! 
अमृत लुटाती सुरों में, 
वह! 'किनक' बोली..! 
छू.. गई दिल! 
चर्चिकी वह 'चिर्प' करती, 'किशोरी'..!

हाय..! वह, कैसी.. किशोरी..?  
किशोरी की  उम्र... में, 
जब, यह चहकती..! 
गान गाती. 
अहा हो, श्रीकृष्ण...के;
मन झूम जाता, नाच जाता,
भूल जाता, सच कहूँ! 
मुझे... सूर पद, लालित्य.. वे।

वह बाल! चिड़िया, 
सुन अरी!  
कभी...
ना...
कमतर लगी, 
उन गीत.. से,
सूर पद के, कवित से
मानव हृदय के, 
आज तक के, गीत.. से।

वन.. अंतरों.. में, 
घाटियों.. में, 
ध्यान.. से, योग.. से, 
उनके लिए,  
सच ! प्रेम.. से,
वह गा रही है, तन्मयी! 
देख कैसे, तभी से...
युग युगों से...
पर्वतों के 
शिखर..  पर!
वह... कूजती है! कूकती.. है!
मधु.., मधुर... भर,  बोलती है..
देख न! श्रीकृष्ण का, 
क्या भजन! वह बोलती है? 
आज भी संयोग से।

भाषा में, अपने..., 
इन अक्षरों में
ध्यान... दें! 
क्या सूर के पद, कृष्ण दर्शन! 
मात्र ही हैं करा देते? 
डूबा.. लेते, 
बाल लीला, सुरसरी की, 
रसभरी उस धार में? 
चिड़िया की बोली, कुछ नहीं
उन ईश के, गुणगान में! 

यौवनों..  में, यही चिड़िया
रस खोजती है, 
कदंब डाली कूदती है
श्री कृष्ण की प्रतिरूप, सी 
वसन 
मटके फोड़ती है।
आनंद सरिता नहाती 
रस स्वयं में, 
और सब में घोलती है।

सोच न! 
ना जाने ऐसी! कितनी.. चिड़ियां!
इस युद्ध के इन देश में,
कुछ... किशोरी! 
कुछ.. बाल शिशु सी,
कुछ और... बूढ़ी..!
अज़लस्त भी दो एक होंगी!
भूख से व्याकुल कहीं
दम तोड़ती...
सोचतीं. 
क्या आदमी को कर्स दें? 
अंडों को खोती.. 
हाय अपने, विलपती 
किससे कहें वो दर्द अपना! 
कोई सुनेगा, 
अरे क्याआवाज उनकी...!
ईरान में, एशिया के मध्य में,
इजराइल के बीचोबीच! 
सोचें, बगीचों में, 
घरों में, वनों में 
मिसाइलों के बीच उठती 
आग में, 
आग की लपटों में सोचो..  
जल रही होंगी!  कहीं..!

मेरी किशोरी, मेरी किशोरी, 
भी उन्हीं के बीच होगी। 

पर मिठाई! है, आज खाई! 
चिड़िया.. है, देखी..
किशोरी...!
क्या...! 
आज बोली..! 
अमृत लुटाती सुरों में, 
वह! 'किनक' बोली..! 
छू.. गई दिल! 
चर्चिकी वह 'चिर्प' करती किशोरी..।
क्या कहा! जल गईं सब किशोरी? 

जय प्रकाश मिश्र
बेजुबान जानवरों और जीवों को समर्पित है ये पंक्तियां! जो आदमी के इस चक्रव्यूह में जल मरे होंगे, या भूख से मर गए होंगे। इस मध्य एशिया के युद्ध में,  ईश्वर उन्हें शांति दें।




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