यह युद्ध क्यों है,
मित्रों, आज के परिस्थितियों पर कुछ लाइने आपको भेंट करता हूं। आपमें यह आनंद भरें यह मां सरस्वती से याचना है।
यह युद्ध क्यों है, सोचता हूँ?
कोई.. बता दो?
मैं..!
पूछता हूं?
कुछ..
भी.. हो!
संतुलित..! एक..
युग्म! बनना.. चाहिए,
हम मानवों के, जीवनों.. में,
'समझ...' का,
'आंतरिक'
और
'बाह्य..' में, समन्वय सा।
गठजोड़ इनका
आज..
यह,
बिल्कुल नहीं है,
सांसारिक.... बस्तुएं,
यह...! कुछ, नहीं... हैं।
विश्वास...
होना... चाहिए,
पदार्थ... ही, अंतिम... नहीं है।
महा.. भीषण! युद्ध था,
एक.. बहुत, पहले,
कामधेनु के,
लिए,
नंदिनी.. कह! गाय.. कह!
जो... कुछ! भी.. कह!
साधन.. थीं,
वह..!
सुख...! मात्र बस!
युद्ध तो,
सुख के लिए था,
बीच विश्वामित्र रूपी.. शक्ति से
और आंतरिक च वाह्य के
उस समन्वय
प्रतिरूप
मुनिश्रेष्ठ श्री.. वशिष्ठ में।
दो शक्तियों, के बीच में..
यह.. युद्ध,
शाश्वत!
सदा से है, आदि.. से।
एक अंधी! एक जागृत!
बात तो इतनी ही है।
लड़ने वाला
कभी... भी, कोई.. भी हो।
देख न! आज है यह..
मात्र!
डॉलर के लिए..
बीच में, वशिष्ठ-विश्वामित्र के तब!
आज! वैश्विक ध्रुवों की
दो.. शक्तियों..
के.. बीच
में..।
ईरान..?
तो.., मैदान है!
यह... युद्ध तो, एक बहाना है
न्यूक्लियर का,
बॉम्ब का
डर...,
मित्र! सारा फसाना है।
एक मूर्ख!
उनको... चाहिए था,
मिल गया, उन्हें एक कट्टर!
जो चाहिए था, मिल गया,
दे सके, जो.. जान अपनी,
मुल्क को,
बर्बाद... कर ले,
सर्वस्व अपना कुर्बान कर,
धर्म... पर!
ईरान सा, वह..…. मिल गया!
चारा था उनको चाहिए
वह मिल गया..!
सेंसर रहे,
जहां..
हर! खबर!
बाहर न जाए, शहरे खबर!
उन्हें मिल गया।
और फिर, क्या?
पलीता..
था लगाना..
युद्ध का
वह.. लग गया..
अब जल रहा है आदमी!
ईरान.. का
उन्हें क्या,
व्यापारी हैं वो,
दास से,
मतलब... ही क्या!
स्वप्न की दुनियां दिखाई,
थी... उन्हें,
और, ध्वंस देकर
दी विदाई है, उन्हें..!
यह खेल है सब!
खेल होगा
शुरू
अब! युआन के
और डॉलरों के बीच में
देख भईया! आगे अब होता है क्या?
कौन 'उनसे' सब कहे...!
लोग खोजते.. हैं,
बेचते.. हैं..
मुल्क
पाकिस्तान सा,
कट्टर! ही.. तो,
एक चाहिए था, उनको भी..
वह...
ईरान में अब मिल गया।
जो नागरिक की जान
अपने दे सके,
मतलब... से
उनके...
दिखावें.. में, धर्म पे..
रनक्षेत्र उनका बन सके!
बिछाई...
बिसात! है, सब...
जीत.. किसकी,
मात किसकी
देखता जा.. मित्र अब!
क्या हुआ था, अंत तब!
क्या दिख रहा है
अंत अब!
एकेन ब्रह्म दंडेन!
सर्वे... शस्त्राणि हतानि मे!
गहर! गहरा! यही है,
तूं! समझ इसको!
अंतर... है
क्या..?
सुख..
"मूल" में है,
स्वार्थ है, अंधा.. हुआ!
और, सुख.. है, सांसारिक!
वस्तुओं में, आज भी
अटका हुआ, लिपटा हुआ।
मृग मरीचिका सा
मात्र बस!
दीखता है, दूर से,
इन तेल सा..!
भीतर कहीं कुछ और है!
इनमें सना...!
पर हश्र.. क्या?
विध्वंश है,
बिना आत्मिक ज्ञान के,
जग.. व्यर्थ... है।
कट्टरता! किसी भी धर्म की हो!
नाश की, जड़मूल है!
चारा है यह, चालाक की,
साधन उन्हीं के काम की ।
आसान यह, विसात.. में
किसी खेल में...
आज के
व्यापारियों की दृष्टि में।
अन्यथा...
संतुलित..! एक..
युग्म! बनना.. चाहिए,
हम मानवों के जीवनों में,
'समझ' का,
'आंतरिक'
और
'बाह्य' में, प्रिय! समन्वय ले।
कुछ भी हो, पापी हैं ये..
व्यापारी.. सभी,
अभियुक्त
हैं,
शत्रु, ये.. हैं, हमारे!
क्या जी.. सकेंगे
सुख.. से
ये...
सुख नींद, इनको
मयस्सर होगी, कभी..?
जी नहीं!
डर सदा होगा,
इन्हें... भी, किसी ध्वंस का!
इनके मनों में,
भय बसेगा सदा ही,
इस कर्म से विध्वंश का।
जय प्रकाश मिश्र
ईश्वर सभी को सद्बुद्धि दे, निरीह और सरल प्राणी विश्व में आराम से रहें यह कामना है।
Comments
Post a Comment