अरे अब, भारत हैं हम, और अपनी भारती।
सभी मित्रों, को पावन होली पर्व की, बधाई और शुभकामनाएं।
मित्रों मुसीबत और मुफलिसी में, दुश्मन कोई नहीं, आदमी.. आदमी से अपना काम चलाता है। आम जीवन आपस में राजनीति की पेचीदगी से नहीं प्यार और दायित्व की सादगी से जीता है। समय है हम जाति-पांति से ऊपर उठ आदर्श नवदेश बनाएं। इसी पर यह लाइनें, आपको भाएं।
उतर आए लोग, हैं.. अब
बहुत नीचे..!
रे, कीमियागर!
खेद है !
तूं अभी, बैठा.. वहीं पर!
दीखती तुझको नहीं,
क्या
जमीं की यह!
वास्तविकता!
अब...
चुग रहे, भूखे हुए,
चूज़े..सभी, हर जात के
संग प्रेम से, नीचे यहां, अब जमीं ऊपर।
क्या करेंगे,
जात लेकर पांत लेकर!
बेकार है, सब..,
और तेरी, कीमती कीमियागिरी...
जरूरत में, मुफलिसी में,
ये सभी... अब, 'आदमी' बस!
इसलिए तो कह रहा हूँ,
बंद कर, दूकान' यह!
अब नया! युग.. है,
सबके हृदय में क्रांति है
परिवर्तन हुआ है
देखकर!
कहां सोया, अरे! मेरा रहनुमा!
आग! ले बैठा हुआ है
पुरानी... वह!
आजतक!
अरे अब, भारत हैं हम सब,
और अपनी भारती अब।
जय प्रकाश मिश्र
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