और इसको क्या कहूं?
आप सभी मित्रों को, बुराई पर अच्छाई के जीत की प्रतीक पर्व होली पर मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं। प्रस्तुत है आज का गीत इस पर्व की पृष्ठभूमि पर टेक लेकर प्रगट होता।
होली यहां है, मच रही,
दीवाली मची है,
पास में,
कई.. रात से,
और उसको क्या कहूं?
लोग हैं,
खुश हो रहे हैं
देख कर,
पटाखा फूटा है किसका
कितना बड़ा,
हम आदमी की जात पे।
अच्छा तो ये था,
कोई भी हो,
जो फोड़ता है, बम धमाका,
भर्त्सना उसकी करो।
पर खेद है,
कुछ लोग हैं, उकसा रहे!
जो, कुछ भी है,
भीषण भयानक, पास तेरे
शीघ्र उसको, दाग... दो।
चल छोड़ इसको, हम बुरा
किसको कहें?
और.. क्यों कहें !
आंख सबके पास है,
जमाना है, मीडिया का,
सत्य सबके पास है।
होली तो है, रंग लाल है
खुशी भी है,
पर,
गम बहुत है, सच अधिक है,
इस बार रक्तिम! लाल है
किसी का हो, कहीं भी हो
बह रहा,
आदमी का हाय! कैसा हाल है।
खुश है, कुछ! कुछ ग़मीं में हैं
त्योहार है, सब मनाएंगे..
पर कहीं भीतर भी कुछ है,
देखकर इस हाल को
सहमा हुआ, चुप है, शांत है
दिल मेरा तो
सच कहूं मित्रों, देख कर ये हाल
आज उदास है।
जय प्रकाश मिश्र
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