प्रेम ही आनंद परमं. प्रेम ही है जीवनं!
मित्रों, जीवन का प्रथम भाग 'सक्षम काल' होता है, इस में हम संभ्रमित होते हैं, और प्रेम जो जीवन के स्वर्णिम पलों का "ग्लू" है उसे तरजीह ही नहीं देते, पर जीवनांत में सब समझ में आ जाता है कि आखिर जरूरत तो स्नेह भरे दो हाथों की ही थी, रूप रंग की कदापि नहीं। इसी पर ये पंक्तियां! आप प्रसन्न हो पढ़ कर, यही प्रयास है।
प्रेम..
'श्री..' है,
मानिए.., शोभन.. यही.. है..,
जीव... का, आनंद परमम्! प्रेम.. है,
आत्मां... की, तृप्ति, भी.. है।
प्रेम... ही,
हर...
जीव.. का..
उद्देश्य, पावन!
उपहार, इसका यदि मिले...
किसी, प्राणि... को;
निर्मल..! विमल..!
प्रिय!
अनछुआ!
जीवन-सुरभि! समझ तो, उसको मिले।
इस...
देह.. को,
किसी... देह.. से,
और क्या... है एषणा..?
नीरव.., निरवयव.. प्रेम.. का,
अनवरत.. आजन्म बस वर्षण मिले।।
प्रेम क्या है?
पूर्णता.. है, तृप्ति.. है,
चाह! की अंतिम.. अवस्था,
भर गई!
और
कोई... अब, नहीं शेष है!
प्रेम...
अंतःशांति..! मन... की;
विश्वास... है यह, हृदय... का..,
बस यहीं तक, सर्व जिसमें आ गया,
तुष्टि है यह उस परा! तक...
जिसके आगे, नहीं.. दिखता...
उत्सर्ग.. यह, प्रिय! सर्वस्व.. का।
इसलिए...
मैं...
चाहता हूं! प्रेम कर लूं!
प्रगाढ़..! इसमें डूब.. जाऊं!
इस जन्म... में, इस... कंठ तक
भीग.. जाऊं,
समस.. इसमें, विलय.. होकर
एकरस हो, पिघल जाऊं हृदय तक।
तुम...
जानते... हो!
मैं.. क्यों... बताऊं!
फूल.., कलियां.. और तारे!
इशारे... हैं!
बता न! हे मित्र, किसके?
किसलिए..?
उर.. खोल कर, ये...
महकते.. हैं,
पंखुरी में, रंग भर भर..?
बुलाते.. हैं!
बता
सबको..
और तुझको, किसलिए?
प्रेम कर तूं! प्रेम कर तूं! इसलिए!
सुरभि सुंदर, मलयगिरि की
चन्दनों... की,
खुशबू...
भरी...
निज, अंक में, हर अंग.. में;
क्यों है, बहती..?
सोच... तो!
नदिया किनारे..
यह हवा ठंडी, क्यों... बिहरती!
ये फूल! कलियां!बदलियां...
कारी कारी! घुमड़ातीं
रस भरी,
टपक जातीं, प्रेम से
इशारे हैं, उसी... के
समझ तो, सब किसलिए!
बस प्रेम कर तूं, प्रेम कर तूं!
परम निर्मल! इसलिए!
इन्हीं सा,
बह..
मन.., हृदय और स्वार्थ का
उत्सर्ग कर,
मुक्त रह! और मुक्त बह..!
ग्रंथि को, हर खोल दे
अगर कुछ है पास, उसको
मुक्त मन से दान कर दे ।
पग दो: आज के युवाओं की समस्या
पर सोचता हूँ
किसको करूं, मैं... प्रेम!
कलियां..!
एक भी, स्थिर! नहीं हैं;
बदलती हैं, रूप!
क्षण.. क्षण..
धूप* के संग चटकती हैं।
धूप से ये चटकती हैं, सूर्य...* की,
पवन से, उर.., मिलाती.. हैं
हिलाती हैं, पंखुरी!
नमी लेकर,
धरा*..
की
मतलबी! हैं।
आकाश.. संग, सब नृत्य... करतीं
मुस्कु...राती.. झूमती हैं,
सामने सब! मेरे ही..
किसी, एक संग रहती नहीं हैं।
बदलती हैं, पार्टनर!
मैं क्या करूं!
देख कर सब, भ्रमित हूं! दिग्भ्रमित हूँ!
महक इनकी, थिर... नहीं है,
रूप भी, स्थिर नहीं है,
भावना है बदलती!
हर एक पल!
रंग.. गाढे, लाल! से..
काला* है होता,
अंत में.
काल से पीड़ित, सभी हैं।
कैसे करूं मैं प्रेम!
कुछ भी, यहां स्थिर नहीं है।
इतने दिनों से सोचता हूँ
किसको..
चुनूं..,
इस जिंदगी में,
कंट्रास्ट कोई बना दूं!
रंग कोई! दूसरा मैं खिला.. दूं!
यह सोचते हैं
पर क्या करें....
इस बात की, स्वीकृति* नहीं है।
पग तीन: जीवन की वास्तविकता
अब है आया समझ में
इतने दिनों पर..
उत्स के दिन*, बीतने पर..
सब एक ही थे,
आडंबर था,
वो...
रंग ओढ़े! रूप काढ़े!
कुल जाति का, कम्बल बिछाए!
धन धान्य का, दीपक जलाए!
घूमता, बाहें उठाए...
शून्य था, सब..
अंत में!
दो हाथ की बस, जरूरत है,
प्यार से, प्रेम से, सद्भावना से,
जर्जरित इस देह* को,
साफ कर,
उठाए,
दिल से लगाए।
इसलिए.. बस प्रेम कर,
सब छोड़कर,
जिंदगी यह प्रेम ही है।
प्रेम से बढ़ कुछ नहीं है।
जय श्री सीता-राम*,
जय श्री राधे-कृष्ण*
वह प्रेम... ही है।
जय प्रकाश मिश्र
भावार्थ:
धूप के संग * अन्य लोगों के साथ
सूर्य...की * एक के साथ
पवन से, उर.., मिलाती.. हैं* दूसरे के साथ..
धरा की*.. तीसरे के साथ..
आकाश.. संग, सब नृत्य... करतीं* चौथे के साथ घूमती हैं
लाल! से.. काला है होता * प्रेम से, बदले में बदल जाती है।
इस बात की, स्वीकृति* नहीं है: सामाजिक बाध्यताएं हैं
उत्स के दिन*, बीतने पर: जवानी के समाप्त होने पर
जर्जरित इस देह* को, साफ कर: सेवा करे, सुश्रुधा करे
जय श्री सीता-राम* सीता राम की आदर्श जोड़ी प्रेम ही है
जय श्री राधे-कृष्ण* श्री राधे का कृष्ण प्रेम निर्मल था जो अलग रह कर भी सतत अविरल था।
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