चंद्र सा, सुख.. है तुम्हारा!

मां रसमणि ने अठारहवीं शताब्दी में कलकत्ता में हुगली के किनारे पर मां-काली का दक्षिणेश्वर मंदिर बनवाया था।
श्री रामकृष्ण परमहंस जी, बेलूर मठ रहते वहां से यह मंदिर जैसे आसमान में चंद्रप्रभा हो चमकता था। वे प्रायः यहां आकर काली पूजा करते। एक रूपक काव्य आपको इसी पर प्रस्तुत है पढ़ें और आनंद लें।

चंद्र सा, सुख.. है तुम्हारा! 
अरी हे..! ताराधिपे! 
दूर.. 
उतनी.., 
आसमां.. पर
मुस्कुराती.., खड़ी.. तुम! 

उतरती.. हो, चांदनी.. चढ़! 
शुभ्र.. कितनी! 
हृदय.. में
शीतल
मधुर 
नव ज्योत्सना..! बन।

अत्यंत धीमे.., और धीमे..., 
पांव.. थामे...
प्राणों... में मेरे! हल्के... कदम!  
शांत, कितनी..., 
शीतली..!  
मिलती.. मुझे..।
 
उस.. एक क्षण में.. 
विलक्षण
निथर कर, 
हो... 
बैठता, 
विलयन.. कोई, 
आराम.. से,
निज ही तलों में।
बैठती हो! 
सहज! तुम, मेरे.. हृदय में।

पर..
सच, कहूं! 
निठुर.. हो तुम! 
निष्ठुरी! तुम! 
कच्चा... कलश हो,
मृत्तिका का, अध-पका!
स्नेह में, हो छलकता...
कमनीय- हो तुम।

दीप्ति! दीपित.. अहा! 
सुंदरि, 
प्रेमरस, 
सुरसरि हि.! हो तुम,
मोहरस, बहती हुई, 
रस माधुरी! रसती.. हुई, 
रसल... हो तुम ।

अधरामृत! 
हों...  
सु-रसते..., 
अरि...  होठ... तेरे! 
जिसके 
हिये, 
हर अंग से, 
मधु बरस करते 
सभी...पर ही नेह रखते!  

यह हृदय मेरा, शांत, निर्मल! 
झील.., हो.. विस्तीर्ण...! 
उतरता.. हो
चन्द्र! 
जिसमें....
वह कृपा हो तुम।

चांदनी..! 
की प्रभा में
तुम झिल झिल..मिलाती..., 
रश्मियां.. अपनी, लिए..!  
खेलती हो, उर्मियों पर लहर ले..ले..! 
लास करती, तरंगित!
बहार्टपकती! 
भंवरी!
अरी.. 
आगाध जल.. के, 
सतह ऊपर, निशानाथी चंद्र का
प्रतिबिंब हो तुम, 
उतर आयी, मेरे हृदय के बीच में ।

दर्शन तेरा, पूजन तेरा, 
संसर्ग तेरा
अहा अमृत! बह रहा हो
नाड़ियों में, कौन है तूं,! 
कच्चा कलश, रस से भरा
माटी ही हो तुम! अन्यथा 
कोई और हो संशय मुझे है? 
इस लिए तो सोचता हूँ
दूर से देखूं तुझे।

रजमणि, हो तुम,
रसमणि, हो तुम,
कौन हो तुम? 
काली की प्रतिमा, दक्षिणेश्वरि! 
के भी पहले, मन में लिया
संकल्प हो तुम! 

अन्यथा काली ही हो तुम! 
बताओ न कौन हो तुम? 
कौन हो तुम? 

रश्मि से भी सूक्ष्म हो,
शिव वक्ष पर तुम
खड़ी
हो,
देखने... में, निठुर हो।
पर, कल्याणमयि 
हे, कालिके! 
वर. 
दायिनी! 
कल्याण... हो तुम! 

जय प्रकाश मिश्र





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