दिल.. मेरा पत्थर का था, पर! रो.. दिया।

भाव: इन महानगरों में कभी कभी जीवन में 360 डिग्री कंट्रास्ट देखने को मिलता है, हम स्तब्ध! निशब्द! मूर्तिवत हो जाते है। अधखिले.. सुंदर गुलाबी फूल को छोटे से बच्चे की कब्र पर चढ़ते हुए देखना अन्तस को रुला देता है, ऐसे ही किसी बहुत बड़े घर के अतीव सुविधा में पले बच्चे को निहायत दयनीय स्थिति में देखना अंतःव्यथ कर देता है। महत्वाकांक्षा आज बहुत बड़ी बीमारी है, जो शीर्ष को ही नहीं मध्यम वर्ग को भी कठोर धरातल पर पटक रही है। इन्हीं पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

मित्रों..! 

विशुद्ध.. सूती, 

कपास... निर्मित, 

परम.. निर्मल.., हर एक कन.., 

नर्मो-मुलायम.., श्वेत.. सुंदर

पर! 

पाद-तल्लक*!  

रूप में, उसे देख कर, 

उस हाल.. में, दिल.. भर गया..

किस्मत.. पे उसकी.. 

और उसकी.. 

पोशीद-ए-उस-परवरिश.... 

उम्दा.. नशीं 

का, खयाल.. कर, 

उसे..

सोच.. कर, दिल.. मेरा 

पत्थर का था, पर!  रो.. दिया।


पूछ.. बैठा 

एक दिन.. मैं.. 

नीचे... बिछे, पादान* से,

कपास थे तुम..

कितने उजले, वहां.. ऊंचे पेड़ पे,

बालक से थे, जब! उम्र में

क्यों पड़े हो, इतने नीचे 

जमीं पर,

तुम, इस तरह, लाचार से..। 


देखा! तुम्हे था, 

एक दिन, तुम पुष्प थे 

तुम शुभ्र थे, 

स्वच्छ कितने,  रेशे.. खिले थे,

पेड़.. पर, उस.. कपास से

लह-लह लहकते, हवाओ संग, 

हिल.. रहे थे। 

ये क्या हुआ? 

तुम!  यहां, इस जगह पर! 

अरे! कैसे? 

इस तरह से पड़े हो ? 


संजीदा हुआ वह, रुख साफ करता

उठ.. गया, पास... आया 

पैर... के, ही पास.. था,

पैर.. से ही लिपटकर..

वह रो.. दिया! 


वक़्त है, 

बेदर्द है, पर्दा भी क्या

अब आपसे.., सच सुनाता हूं..

महत्वाकांक्षा रोग.. है

फिर शोक.. है

आत्म दुर्गति.. मार्ग है...

बच नहीं पाया इसी से...

गिर.. गया, धूल.. में, मैं मिल.. गया

सब लुट.. गया।


पर! अभी भी, 

मैं साफ हूँ! 

आज भी अंदर.. कहीं से,

पाक हूँ..

वह रुक.. गया, 

गला उसका रूंध गया! 

कहता गया.. वह, बात.. अपनी

ये कालिखें, 

ये मिट्टियां, जो सनी हैं, 

जो पुती हैं,

चेहरे पे मेरे, 

एक भी मेरी नहीं हैं, 

मैं आदमी हूँ आम अब, 

जो देखते है हाल मेरा, 

मात्र मेरा ही नहीं है।


कुछ लोग हैं, जो ढूंढते हैं

महत्वाकांक्षी लोग हममें..

फंसा लेते, जाल में

चाल में,

और हम 'अच्छे' घरों से! 

गिर पड़े.. इस ताल में

देख न!  

नतीजा अब 

आज हैं, चुप यहां हेय फर्शों पर पड़े।

पायदान बन कर उन सभी का

जिंदगी को ढो रहे है।

जय प्रकाश मिश्र

पाद-तल्लक* अर्थात पैर-पोछना, दरवाजे के नीचे रखा फूट 





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