एक पेड़ था, एक थान* था, एक देवता था।
एक पेड़ था, एक थान* था,
एक 'देवता*' था,
एक 'देवता*' था,
सामने से
मौन...
पर
वह, बोलता था,
हर.. किसी के
मनों.. में
देखने में, सदा चुप! था।
पहचानता, वह हर एक को,
जन्म के, उस पार* से
कल्याणकर,
सुखद..
शुभ..,
वर, वरद.. था।
आस्था वह, आमजन की,
चिर काल... से था..।
मुक्त.. हंसता, रूप उसका..
सांत्वना का, शांति.. का
प्रतिरूप था,
समा,
लेता.. चित्त को
विक्षिप्त* कैसे..! एक क्षण में,
बदल देता, सहज करता, गजब था।
रूप का संभार था, आकार था,
वह निर्मिति* था,
कला..
था..,
किसी हाथ की,
मुझको लगा, काल ही,
खुद.. बंध गया हो, कला.. में,
चाह कर!
कुछ! ऐसा... प्रिये, था।
भावना!
खुद..
झांकती.. थी,
कल्पना...! खुद..
पर*
लगा कर.. खड़ी थी।
उन पृष्ठ ऊपर, उस मूर्ति में
चमक बन कर!
शील तो हर पोर से ही
टपकता था।
रस मंजरी रस छोड़ती थी,
होठ पर, चिबुक पर
मन विपुल कितने
बंधे थे, थान
से...
मैं क्या कहूं, आश्चर्य था, पर सत्य था।
हाथ की,
इन उंगलियों में,
वास, वसु*..., दस का,
भी.. है,
यह, सत्य.. है,
अन्यथा.., यह मूर्ति
गढ़ दे, मर्त्य!
यह संभव नहीं है!
हृदय.. मन.. हैं,
उतर आते
किस..
तरह, प्रिय!
हाथ में,
रूप बन कर,
खिल हैं, जाते,
कल्पना और भावना
एक साथ मिलकर,
महक जाते,
देवदूती मूर्ति प्रिय!
उदाहरण! तो यही है।
मुक्त.. हस्ता, दान.. दे
मात्र! कोई प्रात में
कर्ण सा,
यह,
वह नहीं है..
अरि! सदावर्ती..., चल रहा है,
सदा से, यहां..ऐसा, एक जैसा...
विशेषता तो यही है।
देवत्व है यह
हर.. समय, उपलब्ध है,
सच कहूं तो, जागता!
कोई सिद्ध.. ही
यह सिद्ध है।
वास उसका!
निर्जन!
कठिन, उन! पहाड़ों... पर
जनवास.. से,अतिदूर!
दुर्गम..!
शिखर के भी, शीर्ष पर!
अवस्थित!
उड़ते हुए उन, बादलों के, भ्रमण पथ पर।
कुछ, भी
कहो,
अंजान था मैं,
आज तक इन देव से...
पर दूर से वह दीखते,
मन खींचते थे, हर किसी के।
और मैं भी चढ़ गया
एक दिन, हो प्रफुल्लित!
उल्लसित, हो सीढ़ियां
उन देव की, और उनसे जा मिला।
दुखद चढ़ना, सच वहां था,
पर, भीड़... थी,
लोग.. थे,
मुरीद..
थे
स्वार्थ सबके, सधे.. थे,
इस लिए, दिन रात
प्रिय
रेले..? नहीं! मेले लगे थे।
उस भीड़ में, एक तरफ बैठा हुआ
एक राक्छस, अतिभयंकर,
दुर्दांत.. अतिशय
घृणास्पद!
मुझको
मिला
वहां ऊपर!
वहीं घूमता, सबसे अलग!
विचित्र था,
देख मुझको रुक गया।
पास आया,
अनपेक्षित, विनम्रता! में,
झुक गया
बाहर से क्यों! अंदर तलक,
मैं.. देख उसको,
सिहरता, सच डर गया..!
कहने लगा वह राक्षस! किस भाव से
"आज तक,
मैं.. जहां गया,
अनादर.., दुर.. दुर..
हटो तुम!
दूर..! ही मुझको मिला।
मात्र! यह स्थान है, यह थान है,
यह पेड़ है, यह शीर्ष है,
इस जगत में,
निर्विकारी, निर्अपेक्षित, निरउपेक्षित
प्रेम मुझको,
वास्तविक! यहीं मिला!
देख मुझ पापी को भी,
जान मेरी, पृष्ठ-भूमी,
शीतल हवाएं,
शांत छाया,
गुनगुनाती पत्तियां
हंसने लगीं।
निछावर मुझपर हुईं
मूर्ति यह! किस देवता की
मैं क्या जानूं!
हर्षित हुई,
मुस्कुरा कहने लगी
तुम पुत्र हो, परमात्मा के
प्रिय.. उसे हो...
प्रिय, मुझे भी हो,
अपने ही घर हो।
तुम,
जगहंत हो, जघन्य हो, निर्मम भी हो
पर, हे पुत्र मेरे!
तुम मेरे हो,
प्रिय मुझे हो।
आज जाना, प्रेम क्या है!
अपनापना,
इस जग में क्या है!
देवत्व क्या है,
देवता की मूर्ति क्या है।
सत्व क्या है, मर्त्य क्या है
राक्षस को, आदमी में,
बदलने की, कला! क्या है।
काश..! मेरा.. और तेरा
ट्रंफ.. आता पास इसके,
बदल जाता जग ये अपना
इस.. जहां में, प्रेम.. होता।
हम सभी मिल जुल के रहते
आदमी, आदमी शायद ये बनता।
पटाक्षेप:
वह... समय था
यह, समय है,
वीरान..! है, सब..!
शांत क्यों, निर्वस्त्र हैं सब!
स्थान पर उस! बम गिरा है
अभी तो,
बॉम्बर बी ट्वेल्व से
ध्वस्त है सब,
देवता वह! पेड़ वह!
अब, शिखर भी वह!
पूछते.. हो क्या हुआ?
चुक.. गया
सब,
पाप उस पापी के ऊपर चढ़ गया..
रूप ले
विज्ञान का उस देवता पर
धीमे.. धीमे..
खजाना खाली हुआ,
अब रो रही है, मनुष्यता!
और वह भी, एक दिन,
आगे अभी है
मतलब! ये दुनियां शेष है,
निःशेष ही अब!
उसके आगे शून्य है, बस शून्य है सब।
जय प्रकाश मिश्र
थान * सिद्ध स्थल या क्षेत्र
देवता* मुक्त हस्त से श्रद्धावान को सब कुछ देने वाला
उसपार से* जीवन एक प्रवाह मान नदी है, इस बार के पीछे से
विक्षिप्त* चंचल मन, उद्विग्न मन
निर्मिति* कलाकारी, स्वरूप
पर* पंख लगा उड़ने को
वास, वसु* समस्त कार्यों को करने वाले उंगलियों के अग्र भाग पर रहने वाले देवता
Comments
Post a Comment