वृथा! सोच है, अपनी मित्रों,

मित्रों, आज की ज्वलंत सामाजिक स्थिति पर यह पंक्तियां आपको समर्पित हैं। आप पढ़ें और आनंद ले।

वैरागी है, तन.. मन.. जिसका

संसारी... वह, कहां.. रहा,

दुश्वारी, तो शब्द.. है, उसका.., 

संसारी... जो, अभी.. रहा।

भाव: एक समय के बाद संसार की गति देख हर किसी को विराग हो ही जाता है, अवस्था प्राप्त होने पर भी यदि चाह बची रही तो दुश्वारियां भी उसे नहीं छोड़तीं।

छोड़, दुराशा.. जग की, सारी... 

तूं अपनी... बस, राह.. पकड़! 

जग फेना है, मिटता.., बनता, 

चिंता., इसकी, तूं... क्यों कर? 

भाव: आज बच्चों, बच्चियों के बड़े हो जाने पर, उनकी गृहस्थी बस जाने पर भी मां पिता की दखलंदाजी और चिंताएं देख और अपनी अनदेखी पर आश्चर्य है। 

रख दे, थैला..,  दे.. दे.. उसको..., 

कब तक तूं.. ढोएगा इसको,  

बीज सड़ेंगें, मिट्टी में... जब

अंकुर! निकलेंगे, तब.. ही, तो...।

भाव: हम कैसे! क्या! और कितना! अपनी संतति को दे जाएं यह भाव छोड़ता ही नहीं। जबकि तप से ही सिद्धि मिलेगी और अपने कर्म से ही वास्तविक सुख मिलता है हम भूल गए। पेड़ बनने के लिए बीज को मिट्टी में मिलकर ही श्रम करना होगा।

कल की चिंता, होगी उसको.. 

प्रत्याशा, जीवन से.. जिसको..

वैरागी का, जीवन.. सुखमय...

प्रत्याशा! अब, कैसी.. उसको।

भाव: मुक्त और चाहना शून्य जीवन ही सुख की राह! अन्यथा आशाएं और बदले में पाने की इच्छा हमें यहां दुख में डुबो देगी।

देख...!  रहा हूँ, 

अपनी.., तेरी..., उसकी.. 

मैं, गति....

एक ही जैसी, एक सरीखी, 

मिलती, जुलती..

जीवन जीती, हर स्टेप पर..

हार गया हूँ! अपनों से अब..

जीत चुका था, सारा  जग! जब।

भाव: यह सच है, आज हम अपनी औलादों से ही हार रहे हैं, जब की संसार को हमने अपने श्रम से इकठ्ठा कर लिया, घर बनाया, गाड़ी खरीदी, जीवन के साधन जुटाए  पर इनके आगे अच्छे अच्छे लोग परेशान! 

वृथा! सोच है, अपनी मित्रों,

बांधे.. हैं, 

हम 

ही..

इस.. जग को, 

पाले हैं, इन परिवारों को

अरे जरा! देखो,  सूरज.. को,

कितना तपता.., 

कितना.. दिपता,  

क्या क्या देता, इस दुनियां को..

और, छोड़ सब, 

जो, जैसा.. है, और जहां.. है

मुक्त सभी से, शांत प्रिये.. वह

निश्चिंत हुआ, 

आ प्रतीचि के आंगन गिरता।

संध्या संग, जा तिरहित होता।


जय प्रकाश मिश्र




आस पास को


अनुरागी, अब.. कहां, रहा..।

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