संसार यह, बिखरा हुआ, एक ढेर है।

मित्रों, संसार बाहर कितना बड़ा दिखता हो लेकिन इसका आकार हम में से होकर ही जाता है अर्थात यह सूक्ष्मरूप से हमारी समझ, जानकारी और जरूरत तक सीमित रहा है। इसी पर ये लाइनें आप पढ़ आनंद लें।

वह! काम्य*.. है, मेरा.. अगर...
चाहना*.. है, हृदय.. की, 
प्यास, कोई.. अधूरी! 
राज* अपना 
पुराना..!
तो..,
ही दिखेगा.., 
शेष, सारा.. सामने 
बिखरा.. हुआ, एक ढेर! है,
राख..! 
उसमें, रज*! कहां? 
यही.., जग है।

और 
हम, भी... 
यहीं... ही; 
तिरते..* हुए, 
बहते हुए, तृण कणों से,
समय सरिता में प्रिये!  
इस काल 
नद 
में
सोचते हैं, 
तैरता*.. हूँ, 
परिश्रम.... से।

समिधा*.. 
इकठ्ठी, कर रहा.. हूँ, 
जीवनों.. की, जी.. रहा हूँ, 
तप*.. रहा हूं! रातदिन, 
मैं... ही अकेला 
मर*.. रहा हूँ!
जीवन 
यही 
है।

लेकिन, इसी में हृदय भी है
यह, अलग है, 
करुणा! 
है,
इसमें, दया! है, यह प्रेम भी है।
यह.., औषधि*.. है, 
टूटे*.. हुए, हर
आदमी..
की..
जिंदगी में
जिंदगी की मार से
हां! प्रिये.. जग.., यही है! 

जो कुछ यहां हो देखती
सधता* इसी में, 
डूबता है, 
घुलता* इसी में, 
पनपता*! 
जग, हृदय! ही है।

एक 
मन..!  है,
बावला..!  है,
डमरूओं सा नाचता है
भरमता! है, इसी में
खोजता.. है, पुष्प... सुंदर! 
लह-लहाता, और 
ताजा! 
बैठना है, चाहता!  
यह, हर... कली, पर! 
जड़ रहित, यह.., जड़*.. ही, है..
मान मेरी, मूर्ख.. है! 
उड़ता.. मगर है, बहुत ऊपर! 
पर, कल्पना... चढ़; 
गिरता भी है, 
पर 
मानता, यह.. नहीं है।

अब, छोड़.. बातें...
आज.. के तो, 
लिए.. 
मित्तर... 
इतना, बहुत... है।

कल.. फिर 
मिलेंगे, 
नए 
गुल* फिर से, खिलेंगे,
मेरे ऊपर..।
नया गुल, जो सबसे, सुंदर,
मुझको, लगेगा,
आप ही के, पद*.. चढ़ेगा।

जय प्रकाश मिश्र
शब्द भाव: 
काम्य*: इच्छित, प्रत्याशित, कामनाएं
चाहना*: चाह, और की लालसा
राज *: रहस्य, कोई गुप्त अभीप्सा
रज*: सक्रियता, सांसारिकता, दौड़ 
तिरते*: पराश्रित, अभिमान रहित, नियति अनुसार जीवन
तैरते*: स्वआश्रित, अपने परिश्रम से, अहंकार युक्त
समिधा*: जरूरतें, सुविधा की चीजें
तप*: कठिन परिश्रम, मेहनत
मर*: मरने की सीमा तक भाग दौड़
औषधि*: ठीक होने का मार्ग, 
टूटे*: हारे हुए लोग, परिस्थिति के मारे
सधता*: रुकना, सहाय, सहारे से, सहायक
घुलता* : ग्रंथि मुक्ति, एक रस हो जाना, हल हो जाना
जड़* : बिना बुद्धि, विचार का, असंगत
गुल* : नए विचार, पुष्प से सुंदर
पद*: सेवा में

Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!