मूल्य बिन, जीवन नहीं है।
मित्रों जीवन की मिठास प्राप्तियों में नहीं बल्कि जीवन में जीवन मूल्यों के साथ जीने में है। इसमें एक संतुष्टि मिलती है अन्यथा सब पाकर भीतर एक खालीपन होता है। इसी पर यह लाइनें आप आनंदित हों यही चाहना है।
संसार..!
है..,
बाहर..! मेरे,
घेरे.. हुए,
मुझको.. यहां!
धन..! संपदा..,
यह..
भू...! धरा,
स्वर्ण, मणि,
मुक्ता.. न जाने
और कितने..
रूप ले..
किस तरह, फैला हुआ,
बिखरा.. पड़ा।
जरूरतें.. हैं, जिंदगी.. की
सोचता.. हूं!
इन्हीं.. से,
पूरी.. तो होंगीं...!
अंत में,
जीवन के इस,
बीच में,
हर, समय ही...
इन्हीं का आश्रय वे लेंगीं!
कलकुलेशन,
मानसिक.. तो.. यही है,
सभी की है, मेरे जैसी
देखती.. हैं,
अभी तो निश्चिंत हूँ!
सुख इन्हीं में है!
क्या करूं!
कैसे बटोरूं!
यह... चाह है!
जल्दी करूं!
पर, हिचक है,
इसके लिए भी..
आत्मा, हो
किसी की..
कष्ट न दूं..।
स्वयं की,
या..और की,
यह ध्यान रखूं!
झूठ का,
मै आसरा, कभी न लूं..
यही..,
चाहिए था,
सच मुझे, यही चाह थी,
सत्य जीता, न्याय चढ़ता,
धर्म करता;
जिंदगी का, परम सुख
पा धन्य होता।
पर यहां, मैं.. देखता हूँ,
सत्य, धीमा! बहुत.. है,
भागता..
ही नहीं है।
संसार की गति
तेज इतनी..
साथ
उसका, पकड़.. पाऊं...
संभव.. नहीं है!
समस्या! मेरी यही है!
इस लिए,
अब.. बदलता हूँ!
रास्ता..
इसे, छोड़ता हूँ!
त्वरित गति
मैं...
पकड़ता हूँ!
सफल हूं,
अब, देखता.. हूं!
सबसे, आगे.. दौड़ में
मैं...
देख!
कैसे दौड़ता हूँ!
दूर हैं अब.. लोग अपने,
घर वो अपना,
प्रेम
सपना
ही.. यहां.. है।
और मैं..
बस भागता हूँ, ध्वंस में एक!
दौड़ता हूँ!
धूल में,
और गंदगी में, सन गया हूँ।
लेकिन, पहुंच कर यहां, अब
इस ऊंचाई पर,
खोखला
हूँ..
अंदर कहीं से,
ठग गया हूँ, जिंदगी में,
भागती, इस जिंदगी से।
देखता हूं!
शून्य.. है, सब!
कुछ.. नहीं है..फलक वह!
जो, खींचता था,
दीखता था, बहुत सुन्दर!
अब लगा,
यहां, पहुंच कर!
इस ऊंचाई पर!
मूल्य बिन, जीवन नहीं है।
मूल्य बिन, जीवन नहीं है।
लड़ाई यह आज की ही
नहीं है
पुरानी है,
पांडवों से कौरवों तक
लड़ाई तो, यही.. है।
कोई मूल्य.. पर
इन जीवनों में
सत्य लेकर जी रहा था,
दूसरा,
हस्तिनापुर हस्तगत कर,
पांडवों पर, हंस.. रहा था।
और देखें,
एक..
पा, श्रीकृष्ण को,
निहत्था,
निःशस्त्र ही,
मात्र! मानव मूल्य पर,
सत्य पर, न्याय पर, धर्म पर
नारायणी... संपूर्ण! दे,
दूसरे... को, कौरवों को,
विश्वास.. से,
किस
महाभारत लड़ रहा था।
जीत का कारण वहां
बस, यही
सत्य था, और जीवन.. मूल्य था।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment