समय ही जब नहीं होगा, खेल सारा कहां होगा।

मित्रों, आज की लाइने हल्की दर्शन से जुड़ी हैं। मौन ही वह गुफा है जिसमें से यह ब्रह्मांड जन्म लेता, और समा जाता है। यह स्थान, पदार्थ, प्रकाश, समय, और अंधकार सब एक ही गुत्थी में जुड़े हैं या कहूं तो मेरे लिए एक ही हैं। अलग कुछ नहीं, इसी पर ये लाइनें आप पढ़ें आनंद लें।

मौन... 
ही.... से.., 
निकलता... सब
मौन.. ही, में समाता..,
आओ चलो, 
कुछ खेल... लें, हम..
कुछ नहीं.. है, हाथ... 
आता...।

आओ..! 
चलें.... 
कुछ.. रख तो, दें.., 
इन, घरौंदों... में, 
टेक*.. ऐसी, 
उठ सकें..,
ये*.., 
मिल सके..., 
इन्हें, कोई रस्ता... 
शांति का... विश्वास का...;
क्योंकि
मौन.. से, ही.. 
निकलता... सब;
मौन.. में ही, समाता..।

उछलते..., 
बीता.. लड़कपन
कूदते.... यौवन, गया...
जाने न कब..., बीती... जवानी...
और... सावन, ढल... गया...।

आ... खड़ा हूँ, 
द्वार...पर,
इस,
देख..! न! 
तेरी.. जिंदगी ऐ! 
जिन्दगी ही, खोजता!  
और... इसका, फलसफा..! 
मौन.. से, ही.. 
निकलता... सब, 
मौन.. में ही, समाता..।

सोच तो, 'स्थान' क्या है?
शक्ति है, 
रोके हुए; कोई...!
शून्य... को, 
बढ़ने.. न पाए, उससे.. आगे
तनिक भी;
दाबे.. 
रहे....
अन्यथा यह लील! लेगा 
एक क्षण! में, 
एक भी, हट जाएगा, 
गर भूल से।
अपनी जगह से।
क्यों कि
मौन.. से, ही.. निकलता... 
सब;
मौन.. में ही, समाता..।

यह
शून्य ही , 
वह राक्छस है 
यह, राज्य को इस, 
महा विस्तृत! अंत देता..।

एक दिन !
ऐसा भी होगा...!
परमाणु रूपी, ग्रह.. 
गिरेगा! 
स्वयं में! 
अपने ही भीतर!
ध्वंस हो, थक हारकर!
घूमता, इतने दिनों से,
क्षय हुआ!
ऊर्जा से अपने!
अपने गहर में, शून्य होता..!
ब्रह्मांड, 
को
भी साथ लेता
तब प्रिये!  स्थान का, 
इस ही नहीं!
हर जगह का लोप.. होगा।

संपूर्ण फैली सृष्टि! यह
शून्य.. हो....गी 
एक दिन! 
यह समय बहता
हे प्रिए! चिर शांत होगा।

हर वस्तु!  
जो... 
बनती, बिगड़ती, देखते.. हो; 
स्थान पर, इस! फैली पड़ी...
इतस्ततः
इसी.. में, स्थान.. है 
अपरिमित! 
इस जहां से और 
विस्तृत..., है  जहां..!
उस में, असीमित।

यह 
'स्थान' ही है, 
शून्य को ललकारता! 
जो खा रहा है, समय को,
स्थान रूपम में, हमें 
वह, समय ही, है दीखता... 
स्थान होगा शून्य, जिस दिन
प्रकाश है यह, 
और क्या
शक्ति है, शून्य को उस चीरती 
हराती हर एक क्षण
हार कर जब, ढल चुकेगी 
तब समय उसमें लिपटता
राख होगा! 
सब एक है, स्थान, यह 
प्रकाश यह
समय यह, अंत में शून्य भी वह! 

इस लिए 
युद्ध भीषण हो रहा है,
स्थान के संग, शून्य.. का
मात्र प्रिय! 
शक्ति का, प्रकाश का 
अंधेरों से, सदा ही
इस धरा ऊपर ही नहीं
अंतरिक्ष में
इस "समय"  समिधा के लिए।
इस समय समिधा के लिए।

इस लिए यह समय ही है, 
कीमती,
हे मित्र! सबसे,
समय ही जब नहीं होगा,
सोच न! 
यह खेल ही ब्रह्मांड का
मेरा तुम्हारा, 
और जग का, कहां होगा।
तब शून्य का, मौन का ही वास होगा।

जय प्रकाश मिश्र
टेक ऐसी * क्लू या सच्चाई ब्रह्मांड की
ये * हमारी आगे आने वाली पीढ़ी











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