मार्केट का हाल क्या है!
मित्रों आज के शेयर बाजार पर आपबीती ही आपको लिख भेज रहा हूं। आप पढ़ आनंद लें, और सट्टा बाजार से दूर हो रहें।
साल, तीसों... हो गए,
देखा इधर था..
समय था,
तब युगल मैं था, पुलकित बहुत था,
मन किया, एक बार देखूं!
पर्दा हटाकर
बाजार क्या है?
और.. फिर.. क्या,..
घुस गया... बाजार में
आई. पी. ओ. नए थे,
निकलते,
दस रुपए में,
प्रीमियम भी कुछ, उन पर, चढ़ा था।
फॉरम भरा! चेक लगाया,
हजार! अप्लाई किया,
सौ.., मिल गया!
पर,
खुश.. हुआ।
पन्ना मिला, क्रमांक था,
हर.. शेयरों पर,
गुद गुदा..।
अच्छा लगा।
यह गुदगुदा, चलता रहा,
जो कुछ भी, बचता,
लगाता
बहुत दिन तक,
बिना बेचें, बिना खोचे,
देख कर ही, खुश रहा।
कुछ बिना पाए,
देखता,
मैं रोज था,
बाजार में, ट्रेडिंग का चढ़ना
उतरना..भी गजब था...।
कुछ चढ़ गए, अधिकतर,
तो उतर गए,
शेष सारे, शून्य हो, कैसे.. कहूं!
बिना पगहा बैल थे,
किस गली, किस घर... गए।
सच है ये, रंग गुलाबी!
अखबार था,
इकोनॉमिक्स
टाइम्स ही था
शायद यही तो, नाम था।
क्या शौक था, देखकर,
अखबार को, दिल!
मचलता!
यद्यपी..
इंग्लिश में था..।
सिर से भी ऊपर ही था।
किस्मत मेरी!
देखते ही देखते,
और इसको क्या कहूं!
नाम मेरे, शेयरों का
अखबार के भी प्रिंट से,
ओझल हुआ ।
रखे हुए हैं आज भी
कागज हैं कुछ!
रंगीन से,
पर... क्या करूं! भाव रद्दी के
नहीं बिकते अभी...!
नाम ले लूं, चाहते हो,
बता दूं!
फोन करना, लिखा दूंगा!
दर्जनों हैं!
पर
निर्वस्त्र वे पहले से हैं
अब उन्हें और मैं और क्यों
स्टेज पर नंगा करूं।
पर
सत्य है,
चूना.. लगा,
मुझको... गजब!
और मैं, फिर हो गया
इन सभी से, पूर्णतः सच में अलग।
कसम खाई! मेरे भाई!
छोड़ दूंगा
मोड लूंगा, आज ही इन्हें
मरोड़ दूंगा!
कहीं खोंस दूंगा।
हुआ भी,
पर क्या कहूं!
इस बार के,
इस रजत के!
स्वर्ण के,
चढ़ते, कदम ने
दिल! छू दिया!
जिंदगी
के,
इस उतरते, घाट पर..
एक फिर,
और गहरी पटखनी
यह दे गया।
हैरान हूँ,
अचंभित हूँ,
देख कर बाजार को,
चोट खाई फिर से गहरी,
इस सिरफ़िरी... बदजात् से।
इसलिए अब चाहता हूँ
लिख ही दूं
उद्गार
अपने दुखी मन का..!
तो सुनो,
बाज़ार क्या है, चोंचला है,
कुछ नहीं, यह बनाता,
कुछ नहीं यह बेचता!
कुछ नहीं करता है
यह...
अड्डा बड़ा है,
बड़ों का...
सट्टा
प्रिये है, कर्मठों के कर्म का!
व्यवहार का,
लाभ का या हानि का
कंपनी के
भूत का भविष्य का,
संभावना का, बिखरने का
सुधरने का, एक क्रैडिट
कार्ड कह लो..
व्यापार है..।
पर जुटे हैं सब
लुटे हैं सब
चींटी हुए
चींटा हुए पिले हैं सब!
खेल था सटोरियों का
नौकरी पेशा,
कहो, किसानों तक
इसी में तो फंसे हैं सब।
सागर! हलाहल लहरता है
रुपयों का, सेंसेक्स बन
लहर आतीं, उर्मियां हैं नचातीं
ज्वार आता, भाटा है आता
सागरों सा।
पर, कभी तूफान आता
सभी का,
सभी कुछ बटोर जाता..।
खिलाड़ी हैं, तैराक हैं,
जो डूबते हैं
बहुत गहरे।
मोतियों को पा भी जाते
कुछ भाग्य से अरे! उथले।
पर बुरा है यह मान मेरी,
हर तरह से, हर तरह से।
जय प्रकाश मिश्र
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