और क्या है, जिंदगी! जिसको लिए, फिरते सभी!
मित्रों, जीवन एक प्यास च तृष्णा जो पूर्ण होना तो चाहता है, पर प्रकृति के आंगन में उसके सौंदर्य और छलना में बार बार अतृप्त ही लौट जाता है। इसी पर यह पंक्तियां हैं आप पढ़ें और संतुष्टि पाएं।
यह... प्रकृति!
छलना... मयी!
है... खींचती..!
मुझे...
आप.. में,
एक रस कर, साथ में
निज संतति की चाह में,
जीव में, मुझे बदलती है,
देह रूपी पाश में
मुझे
बांध कर,
अंत में फिर छोड़ती है।
साथ में, मिल कर, रहेगा
कुछ, नया हितकर,
करेगा..
खिला.. देगा,
धरा मेरी, आनंद देगा..
आनंद.. लेगा.
और क्या है, जिंदगी!
जिसको लिए, फिरते सभी!
प्रकृति है,
छलना मयी!
रसनामयी, रसमयी!
खींचती,
पर..!
प्यास हैं, हम..!
इंद्रियों के, दास हैं हम,
सत्य है यह, मानते.. हम!
और, तृष्णा.. को लिए "मैं.."
उम्र भर... इन
इंद्रियों..
की,
भरमता, हूं।
रस... खोजता हूँ
घूमता हूँ, तरसता..हूँ...!
उतर आता,
यहां नीचे, हाथ में,
पाश में,
पंखुरी.. के, रंग में,
प्रेम में, इस महकती!
धरा ऊपर,
स्नेह
करते युगल तन में
और भरमता हूँ, जिंदगी भर!
बस इंद्रियों की, प्यास में।
और क्या है, जिंदगी!
जिसको लिए, फिरते सभी!
इस.. प्यास से,
मैं.. अधूरा
हूँ..
दूर हूँ, तृप्ति से
यह जानता
हूं!
सृष्टि के नियम यहां हैं,
कठिन... पहरे!
मानता हूं।
निष्ठुर नहीं तुम!
तृप्ति देना जानती हो!
चाहती हो, खिल उठे,
धरा रूपी देह यह!
पुन पुनः फिर से,
पुष्प उभरें.. देह से
देह में आनंद, बिहरे..
स्नेह.. से,
पर प्यास! मेरी, नियति है!
मैं क्या करूं!
साथ हूं, पर अलग हूँ
हे! प्रकृति तुमसे..;
और क्या है, जिंदगी!
जिसको लिए, फिरते सभी!
जय प्रकाश मिश्र
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