क्या शून्य भी छोटा बड़ा है!

मित्रों, हमारा यह विस्तृत संसार, उस परम सत्ता के बृहद घर में रखी हुई एक छोटी सी वस्तु से अधिक हैसियत नही रखता। उस विराट सत्ता के लिए यह संसार और पृथ्वी किसी विशेष महत्व की नहीं और हम सभी एक सूक्ष्म कीट से ज्यादा नहीं और हमारी जिंदगी के सारे लक्ष्य और प्राप्तियां निकिसी भी मतलब की नहीं। इसी पर आप आज की लाइने पढ़ें और आनंद लें।

संसार भी तो, 'वस्तु' ही..  है,
कितनी...! बडी..  हो! 
आयतन.. 
में,
चांद, तारों, से भरी.. हो
ग्रह.., नक्षत्रों.. से, सज़ी हो।

बेशक! प्रिये, संसार यह! 
आकाश.. गंगा! 
हजारों...! 
ले... 
गोद... अपने, तैरता... हो
काल... नद के, 
पाट... में 
हिंडोल करता हिलकता...हो
हहर करता शून्य में,
यह बिहरता.. हो 
पर हमेशा, यह.... 
शून्य के, भीतर... ही  है..।

सोच, प्रिय!  
संसार यह..! शून्य से भी, 
और.. छोटा..
बता न!  
अस्तित्व तेरा और मेरा!  
अरे अब! 
कितना बड़ा...! कितना बचा! 
संसार ही जब,  इतना... छोटा..।

सब जानते हैं, 
सत्य है 
यह...
पृथ्वी... हमारी, 
नाचती है, शून्य.. में... 
पर, वहां पर कोई नहीं है, 'धुंधकारी'
आग!  कितनी धधकती हो!   
लावा अरे! 
पृथ्वी के दिल में,
किसी  का भी वश नहीं है, 
हे प्रिये! उस शून्य में,  
और उसमें हो रहे, 
अरे! इस रात दिन में।

अन्यथा!  
काल... पर...
पहरा भी होता, आदमी का..!
अच्छा हुआ, वह शून्य है।।।
कुछ भी, नहीं... है
इस लिए वहां पर इस आदमी 
का वश नहीं है..।

लेकिन.. 
हे मित्रों सत्य है,
शून्य भी छूटा नहीं है 
आदमी से
"शून्य"  भी 
आज  मित्रों! 
अमेरिका का इंडिया का, 
चीन का और रूस का
सत्य है,  ये...
छोटा.., बड़ा.. है? 

कुछ भी हो
स्वर्ण सी.. आभामयी..! 
यह सृष्टि अपनी, 
धरा पर  इस..
इस...  तरह , रखी हुई ! 
अचंभा है, 
किस,... तरह
इतने दिनों तक, चल गई...
अंधेरों.. पर, राज.. करती, 
कितने!  दिनों से, 
अकेली 
इस शून्य में
दीखती! विस्तृत, बडी.. !
लेकिन प्रिये! 
सत्य, 
यह... है!  
संसार भी, एक वस्तु ही है 
सीमित भी है।

रूप इसका बृहद हो! 
बहुरंग, रंगी.., 
विशद 
हो! 
स्वतः चालित, संयमित हो! 
पर क्षीण होता, क्रमिक... है।

भाग, इसके बहुत.. हैं
दूर तक फैले हुए हैं
कुछ, कहो.. 
जैसे... 
भी.. हों,  
देख.. न! 
सभी तो हैं शरीरों से, 
मिल., बने..।

संसार रूपी वस्तु अंदर 
कैसे ये देखो!  आंतरिक, 
सब कार्यक्रम 
स्वभावतः 
ही... हो रहे ...
पर सत्य है ये...
रावण के जैसे ट्रंप पैदा हो गए
जो अड गए हैं नाश.. पर
कोई, इनका क्या करे? 

बेशक, जुड़े हैं हम सभी 
और यह समष्टि 
सारी...
जन्म.. लेती, 
मृत्यु... मरती
जिंदगी...भी,  जी... रहे ! 
प्रार्थना है,  
हे प्रभो सद्बुद्धि इनको भी मिले।

सोचिए उस घर की हालत
कैसी होगी, 
जिसमें रखा है
विश्व यह, ब्रह्मांड पूरा....
एक कोने...,
निरर्थक, बेकार सा,
गेंद सी, लटकती,  पृथ्वी  ये अपनी
एक... कण, सी.., नाचती...  
हिलडुल रही,पास ही,
अपने से, खिलती 
मुस्कुराती,
करतबों से मानवों के
दुखी होती, शर्म करती 
शेष कण से, हेठ रहती...।

निझर झरती, 
रो रही
पुनि गा रहे इन 
पक्षियों को देखकर
पल्लवित हो,, पुष्प भरती
समय के संग
रात दिन चुप चुप वहीं है घूमती।

आवाज तेरी, और मेरी 
वहां पर, प्रिय! 
यह..., कुछ नहीं है, 
एक भ्रम है, 
सचमुच ये अपनी जिंदगी ।

प्रकाश आए, कहीं से भी, 
दूर.. से, नजदीक.. से
सूर्य से, या चंद्र से, 
ऊष्मा.. ले, ऊर्जा... ले
कहीं से,  
लेकिन नहीं कुछ असीमित! 
सीमित ही है वो! 
अरे! क्यों की, संसार भी एक वस्तु है तो।

इस लिए तो पूछता हूँ
तो बता न! 
कहां है! 
वह अनंता! 
बृहद!  है जो.... देख!  कैसे.. 
एक... 
इस, संसार रूपी.., बस्तु... में
सीमित पड़ा! 
कुछ भी, कहीं..., हो..., 
आखिर यहीं, वह अनंता!  
संसार रूपी वस्तु में 
सीमित.. पड़ा। 

जय प्रकाश मिश्र

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