अरि.. ओ, नवोढ़ी...!

मित्रों, प्रकृति भी विचित्र है! इसकी विचित्रता पर एक संक्षिप्त रस-रंजिका आपके आनन्दार्थ प्रेषित है।

अरि.. 
ओ, नवोढ़ी...! 
क्या.. क्या.., तूं... 
ओढ़ी! 
क्या..! न.., ओढ़ी..
कितने.. तरह के, 
रंग.. घोली! 
कैसे.. बनाई? 
कैसी बनाई!  भ्रमों.. की 
तूं...! यह, रंगोली..!

हे.. 
रसोढी...! 
कितने तरह के रस.. 
समो..ली! उदर अपने
रे... किशोरी...! 
केशुओं... में, इतने.. लंबे 
किस.. तरह
बदलियों.. को, बांध.. कर, 
उड़ती... रही, 
खुद..!
उतने..! ऊपर, बादलों में!
देख कैसे?  बरसकर,  
मिनट भीतर...
सबको.., भिगो.. दी।
बता, न! कितने तरह के 
और कैसे, रंग बिरंगे 'छंद' घोली?

टुप.. टुप..,   टुपुकती.., 
दिवस निशि.., 
हे, माधुरी! 
रस... मधुर, री! 
तरुअन.. के पत-पत, 
हवा बन बन, 
किस तरह!  तूं! सर,सर-सराती.
हे.. घुमोड़ी, उपवन में डोली...,
री..., रंगोली!  
बता न! 
कितने तरह के, और कैसे, रंग घोली।

रात, 
तूं! कल, रात..
सारी.... रात, बरसी, 
बिन रुके! बिन थके
तरुपात.. सूने..! देख कैसे! 
लटकि.. आए,
भीगते.., रातभर.., 
अरि! देख न, कितने..हैं! नीचे..., 
फिर सुबह होते, 
भोर, पहले...
ओस की चादर बना, उन्हकों डुबो दी...
हे रंगोली! बता न! 
कितने तरह के रंग घोली।

पेन्हाई..., 
गैया.. थी, मोरी 
सांवरी! सच लाडली..., 
अरि! कितनी.. भोरी! 
पर तूं!  नटोली! जाने, न कैसे! 
मुंह चिढ़ा दी, अरी उसको
बिदक कर! मारी पिछोड़ी... 
हे रंगोली! बता न! 
कितने तरह के रंग घोली।

जय प्रकाश मिश्र



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