यह.. गीत मेरे तीर.. हैं, कागज, स्वरूपी.. 'धनुष' पर..
हे मित्र..!
मेरे.., गीत... क्या हैं?
कुछ.. भी, नहीं!
यह!
शब्द भर... तो!
पर कौन हैं वो... ?
जो..
चाहते... हैं
शब्द भर... तो!
पर कौन हैं वो... ?
जो..
चाहते... हैं
जानना..! 'वजन'.. इनका,
और, तौलते.. हैं, 'तराजू'.. में..
'बाट' ले, ले...
शायद..., नए.. हैं !
शायद..., नए.. हैं !
गीत, मेरे..
इशारे..
उस.., 'तीर'.. को हैं,
जो... 'कैद' में हैं
'अंधेरों'.. के..
भाग्य.. से, दुर्भाग्य.. से,
कर्म से,
कारण, कोई... हो
वे..., 'लक्ष्य',.. बेधेगे..., कहां....से?
और... कैसे? कितने गहरे!
इस 'व्यवस्था' की
'कैद' से,
जो
आज तक
हैं..., अंधेरों... में,
'उनके' लिए हैं, गीत.. मेरे।
मात्र...
हैं..., 'उनके'.. लिए।
कैसे...,
कटेंगे.. रज्ज़ु... कुटिला, कठिन रे
मस्तिष्क... के, भीतर हैं जो..
बंध रहे,
इस जन्म के! अरे ना
नहीं प्रिय..
और पहले.. जन्मांतरों से।
पता उनको ही...
नहीं, वे 'बंधे'
भी हैं;
'अदृष्ट' प्रिय, "प्रिय".. बंधनों में!
यह.. गीत मेरे
तीर.. हैं,
कागज, स्वरूपी.. 'धनुष' पर..
रखे हुए, सच...!
तुम, "दिशा" इनकी 'नोक'.. इनकी,
मात्र देखो!
क्या कह रहा है
शांत यह!
निर्भीक... हो
यह 'तीर' है..या 'तर्जनी'.. है,
ध्यान रखो...।
प्रिय!
शब्द... मेरे! 'मूक' हैं,
तुम्हे 'देखने' में
तुम बोलते हो, कुछ न कुछ!
जो कुछ "हिए!" से
पढ़ कर
इन्हें,
उससे ज्यादा, शब्द मेरे कुछ.. नही हैं।
इसलिए, इंगित... किए,
दिख.. रहे..,
उस, लक्ष्य.. को, "आकाश".... में,
चमकता, जो.. चंद्रमा है,
देख! उसको...।
गीत मेरे, शब्द.. भर तो।
अब! आवाज.. सुन!
थोड़ा ध्यान से!
मुझको...
बता,
ताली की उस...
जो,
बज.. रही, एक हाथ.. से।
सुनी क्या!
कैसी... लगी!
कोई नहीं आवाज! थी,
शब्द.. ये,
बस.. इशारे हैं, तीर.. से, गुनगुना इनको..।
चल बता दूं, इस बार..
इसका...
अर्थ, क्या.. है,
ध्यान.. दें
मत साथ दो अन्याय का,
अतिचार का, अपचार का, अभिचार का
मत सुनो जो सुनाता है
दुष्ट तुमको,
जवाब.. मत दो...
बस छोड़ दो, अकेला
हर, निम्नता को, नग्नता को,
नृशंस.. को,
फिर सुनो, आवाज प्रिय!
ताली, की उस...
जो.. बज रही, एक हाथ.. से।
कैसी लगी, अच्छी लगी
क्या...!
तो आज से इसे, ध्यान दें!
एक हाथ की ताली सुनें,
पर.. धैर्य से।
कितना.. समेटें, अर्थ,
प्रिय!
ये... शब्द, भी...
सीमा.. है, इनकी..,
अक्षरों... की,
संचरण..
तो.. बीज है, अंतर्मनों में,
उगता है, खुद ही..।
विचारों को जगा दें,
एक बार..
बस
कोलाहल मचा दें,
उठा... दें
मुर्दों.. को भी
ये.., शक्ति इनकी..।
हर शब्द में
एक... आत्मा है,
आत्मा ही, बोलती.. है
प्रसरती.., विस्फोट.. करती,
जीवनों.. में,
प्राण... भरती, उठा.. देती, विप्लवी.. है।
शब्द का आकार!
तो
यह, देह.. तेरी..
दीखती है, सांवली प्रिय!
कागजों पर, छप रही,
आत्मा विदेह है, दिखती नहीं है,
संनिहित है, देह में,
सांसे है भरती,
निकलती है, रूप पाठक का पकड़ती
भावना.. में विरमती है।
खलल करती विचारों में, लक्ष्य को तब बेधती है।
मेरे, ये..
गीत.. क्या हैं, कुछ नहीं!
शब्द... भर... तो..
पर, इशारे हैं.. लक्ष्य के..
निकलेंगे कैसे,
कैद से,
यही.. सोचता हूँ,
क्या करूं!
प्रिय रात दिन,
वो..! प्रिय मेरे! उन अंधेरों से।
जय प्रकाश मिश्र
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