फूल खिलते हैं, मरी...माटी में, जब रे!
मित्रों, संवेदना यदि मर जाय तो मनुष्य में क्या बचेगा कुछ नहीं यही तो मानवता का मूल है। यह हम प्राणियों में ही नहीं इस पूरी प्रकृति में भी वैसी ही संव्याप्त है। आज हम दुनियां को पाने के लिए इसे छोड़ते जा रहे हैं। इसी पर एक सच्ची आलोक-सरिता आप के लिए।
फूल, खिलते हैं,
मरी...
माटी में, जब रे,
अये...! कैसे..!
चहक उठती है, फ़िज़ा!
इन्ह, रौशनी से।
चमन, बन जाती है माटी,
रंगों.. से, इन्ह!
खुशबू लुटाती.., बिकेरती... है
हाथ दोनों, रात दिन!
माटी में, जब रे,
अये...! कैसे..!
चहक उठती है, फ़िज़ा!
इन्ह, रौशनी से।
चमन, बन जाती है माटी,
रंगों.. से, इन्ह!
खुशबू लुटाती.., बिकेरती... है
हाथ दोनों, रात दिन!
बिना देखे,
कीट जैसे शत्रुओं को,
भृंग जैसे मित्र को, रे..!
प्रफुल्लित इन पुष्प को
ताकते.., झांकते..
जब..
आंचलों.. से,
डालियों.. पर, देखता हूँ,
हिलकता... है,
उर.. मेरा,
लहर लेता, मन ये... रे!
ऊपर से नीचे,
हुलसता...
हूं,
झूमता.. हूँ, साथ इनके,
कीट जैसे शत्रुओं को,
भृंग जैसे मित्र को, रे..!
प्रफुल्लित इन पुष्प को
ताकते.., झांकते..
जब..
आंचलों.. से,
डालियों.. पर, देखता हूँ,
हिलकता... है,
उर.. मेरा,
लहर लेता, मन ये... रे!
ऊपर से नीचे,
हुलसता...
हूं,
झूमता.. हूँ, साथ इनके,
ये पुष्प! ना हों,
फूल से! बच्चे.. हों... मेरे!
पवन के संग खेलते हैं,
फूल जब!
छुप्पम.. छुपाई..!
झां...खेलते है, इठल करते,
छुपते छुपाते
पवन के संग खेलते हैं,
फूल जब!
छुप्पम.. छुपाई..!
झां...खेलते है, इठल करते,
छुपते छुपाते
पत्तियों की आड ले,
पुनि निकलते है, ताज़गी ले!
डूब जाता हूँ, मैं... गहरे!
पुराने.....
निज, मस्तियों के, ख्वाब में...।
क्या हुआ है आज!
क्यों, खामोश मिट्टी!
इस तरह है...?
हवाएं, मासूम! हैं,
जगह अपनी, रुक गईं हैं..।
लहर! सारी, थम गईं हैं
चंचला,
पुनि निकलते है, ताज़गी ले!
डूब जाता हूँ, मैं... गहरे!
पुराने.....
निज, मस्तियों के, ख्वाब में...।
क्या हुआ है आज!
क्यों, खामोश मिट्टी!
इस तरह है...?
हवाएं, मासूम! हैं,
जगह अपनी, रुक गईं हैं..।
लहर! सारी, थम गईं हैं
चंचला,
इन
हवाओ.... की.., चुप ये क्यों है?
भारी... सा मौसम
क्यों.. हुआ है...
इस तरह सब रुक गया है..।
रोशनी जो चटख थी,
इतनी...
धीमी...., क्यों हुई है?
फूल तो फूले हुए थे!
पंखुरी सब ऊर्ध्व थीं।।।
क्या हुआ है,
भारी... सा मौसम
क्यों.. हुआ है...
इस तरह सब रुक गया है..।
रोशनी जो चटख थी,
इतनी...
धीमी...., क्यों हुई है?
फूल तो फूले हुए थे!
पंखुरी सब ऊर्ध्व थीं।।।
क्या हुआ है,
बता न!
लटक क्यों.. नीचे गईं हैं ?
लटक क्यों.. नीचे गईं हैं ?
आंख जो थीं चमकती
रुआंसी सी क्यों हुईं... हैं?
सुनोगे?
सच.. कह, ही दूं!
एक बेटा, बाप के ही सामने...
रुखसत... हुआ है,
आज ही...!
बिन कहे, एक शब्द उससे!
गुप, चुप.. अभी!
रुआंसी सी क्यों हुईं... हैं?
सुनोगे?
सच.. कह, ही दूं!
एक बेटा, बाप के ही सामने...
रुखसत... हुआ है,
आज ही...!
बिन कहे, एक शब्द उससे!
गुप, चुप.. अभी!
जी, पवन ही....।
इसलिए, सब.... दुखी है,
विदाई सी.. दे रहे हैं,
नतमस्तका हैं!
ये.. पुष्प हैं, बेशक.. प्रकृति हैं,
इसलिए, सब.... दुखी है,
विदाई सी.. दे रहे हैं,
नतमस्तका हैं!
ये.. पुष्प हैं, बेशक.. प्रकृति हैं,
आज के
इन्ह आदमी से बेटर हैं...
संवेदना से हीन न... हैं।
आदमी... ये नहीं हैं,
इसलिए निष्ठुर नहीं हैं!
संवेदना से हीन न... हैं।
आदमी... ये नहीं हैं,
इसलिए निष्ठुर नहीं हैं!
आपसी झगड़े से ऊपर
सदा ये हैं...।
दुनियां प्रथम इनके लिए
बिल्कुल नहीं है।
दुनियां उठा ये!
रातदिन,
सिर पर नहीं,
बिल्कुल नहीं है।
दुनियां उठा ये!
रातदिन,
सिर पर नहीं,
कभी.. घूमते हैं...।
मांगता हो, हेल्प कोई
कभी ये पीछे नहीं हैं
मृत्यु के इस दुखद पल में,
देख! कैसे दुखी हैं!
मृत्यु के इस दुखद पल में,
देख! कैसे दुखी हैं!
आदमी से, उच्च... हैं,
आदमी, ये.. नहीं हैं।
आदमी, ये.. नहीं हैं।
जय प्रकाश मिश्र
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