फूल हैं ये.. इन्हें कांटा न लगे

मित्रों, बेटियों से बड़ा कुछ नहीं। आज की लाइने उन्हीं पर लिखी हैं, आज मेरी दोनों पौत्रियों का जन्म दिन है। उन्हीं के लिए यह रचना है आप पढ़ें आनंद लें।

ये खुशबू!और हवाएं!  
मेरे 
घर में,
मेरे साथ रहीं, 
पैदाइश से,
अपने बचपन तक..।

प्यारी उतनी लगीं मुझको
भोली जितनी लगी इनकी सूरत! 
हंस दें, ये
तो, 
महक जाए मेरा घर! 
मुस्कुरा दें ये
तो गुनगुनाता है, शज़र...।

बेटियां हैं,
मेरी.., 
समझ से बाहर हैं
मुलायम इतनी की शर्माए बटर..
एक छाया, 
नमी लिए, फिरती है
मेरे जुस्तजू,ये ऐसी! 
बोल दें,हल्के 
तो 
झर जांय गुलो-गुलशन।

अमृत! 
देखना है,
तो मेरे घर आना कभी
देखना कैसे 
निर्दोष आंखों में, 
डूबा है,
अमृत भरा उछलता.. सागर।

लक्ष्मी! 
कितनी शुभ्र! 
कैसी होती होंगी,
कैसे चलती,कैसे फिरती होंगी, 
ये खुशबू!और हवाएं!
बन... 
मेरे घर में,
मेरे 
साथ रहीं, 
पैदाइश से,
अपने बचपन तक..।

बच्चियां हैं, 
ये.., 
नियामत उसकी..!
अपने लिए तो बस 
इबादत.. इनकी! 
फूल हैं 
ये..
इन्हें.. कांटा न लगे! 
मेरी तो बस इतनी ही 
इल्तिज़ा-ए-बिनती है सबसे।

जय प्रकाश मिश्र







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