चाहती.. हूँ! बआऊं! सुंदर..! खतोना...!

मित्रों, नारियां सामान्यतः सहज और सरल और सौंदर्य प्रिय होतीं हैं, नीड बनाना इनकी मूल प्रवृत्ति होती है। इसी पर कुछ लाइने आपके आनन्दार्थ। 

यही तो 

फितरत! है, मेरी... 

हे, प्रिये! सदा... से, 

बस.. 

चाहती.. हूँ! 

बआऊं! सुंदर..! खतोना...! 

शौक है, यह.. 

बचपने से, आज का ना.., 

पुराना...।

तब.., 

मिट्टियों से, बनाती थी, 

हाथ से 

इन्हें, लीपती.. थी, 

खेलती.. थी, सखी.. संग! 

घरबार का... 

यह खेल, अप्रतिम..! मनभावना...। 

तुम नहीं, जानोगे इसको..

तुम नहीं समझोगे इसको...

इसलिए एक, सच सुनो, 

मम्मी से पूछो..

खेल , यह

हम लड़कियों का, 

दादियों.... से, है.... पुराना ।।।


इसलिए आओ... चलें,

हम... 

तृण उठाएं! 

चोंच से, संजीदगी.. से,

प्यार से, 

एक साथ मिलकर !

और रख दें, डाल पर 

प्रि...य 

इसे.., मिल, आनंद भर कर!

सुंदर, सुखद, एक घर बनाएं।
 
बनाएंगे, 

मृदु.. मधुर... 

हम....

प्रीति का 

सुंदर सा, एक घर! 

भाव भर भर, स्नेह का, 

कलश सा, रससिक्त मधुतर।

इसलिए 

अब, आ..., पकड़..., 

मेरा हाथ, 

मेरे... साथ चल...!

घर बनाते है, फूल से, नव पुष्प से

महकती, जुहू! कली से,

रंग बिरंगी, पंखुरी से, 

कोपलों की, ताजगी से 

तितलियों की, रवानी ले, 

तेरी.. मेरी... दीवानगी ले,

तेरी.. मेरी... दीवानगी से..

बालको से भरा हो घर

यही तो 

फितरत! है, मेरी... 

हे, प्रिये! 

बस.. 

चाहती.. हूँ! 

बआऊं! सुंदर..! खतोना...! 

हे प्रिये 

तेरे ही, संग,.. रंग, सारी उमर भर।

जय प्रकाश मिश्र






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