क्षीर सागर, देश तेरा मिल तो इससे।

मित्रों आप आखिरी तक पढ़ें और दो स्टैंजा बाद ही एक अलग दुनियां की सैर करें। यह आपकी अपनी दुनियां होगी। सुंदर और शांत और मनोरम।

एक ही, 

सागर यहां रे, 

एक ही तो गहर! है

लहर भी सब एक ही हैं

अंतर कहां फिर 

किधर है! 


शून्य है सब, 

कुछ नहीं, जग..! 

मौन है सब! 

उलझने, तब तक प्रिये थीं,

रास्ते, जब अलग थे,

दीवार.. ही, अब है नहीं

जब.. गिर  गईं

तो.. कहां हैं,  घर? 

किसी और का,  अपना प्रिये!  

अब... एक हैं, सब।


घर, अब कहां हैं, किसी का,

छत, एक... है, 

इस आसमाँ की, पेड़ की, एक.. 

सबके ऊपर..

और सब, अब एक ही हैं, राष्ट अब।


जो जागता है, जानता है

बात सारी...

जो स्वप्न में है, लड़ रहा है, उन्हीं से..

खुदी से, देख न! 

उम्र भर, ता जन्म तक।


छोड़ दो, थोड़ी देर को

तुम तोड़ दो, आंख अपनी मूंद लो

प्रिय...

इस पल पल बदलते विश्व से,

यह, लुभावना है, 

लपलपाती अग्नि है, 

भस्म करती, क्षणों.. को

देख कैसे, संग ले, हर एक को!  

आ, इधर आ..

अपने ही भीतर..

एक राज्य है, जरा मिल तो इससे...

छोड़ तो, ये डोर.. पतली रेशमी

कनक की, कामिनी की, 

खनक की

लौट आ प्रिय!  

छोड़ सारी डोर, यह है.. 

कुछ क्षणों की।


इस विश्व से कुछ अलग है,

गुण नहीं कोई यहां जो 

गति.. तुझे दे..

अब प्रकृति है, अपनी प्रिये!  

बस संग तेरे, 

अनिवार्य जो था

वह बचा है साथ तेरे..! 

अनुभूति अपनी 

स्वांस अपनी

साथ है

शेष सारा शेष है

अब भस्म है..

स्थिर है यह, चित शांत है

तेरे ही भीतर 

स्वभाव में, प्रकृति तेरी,..

मूर्धजा! अब मिल तो इससे! 


क्षीर सागर, 

शांत कैसा मुक्त सबसे..

कौन अब तूं! आ.. देख फिर से..

एक सांस आती.., पुनः जाती..

और तूं, प्रिय साथ उसके।..

शांत रह, चुप, छेड़ मत यह देश है

तेरा प्रिये मिल ले इससे।


एक दूसरा संसार है प्रिय!  तेरे भीतर

अत्यंत विस्तृत! मनोहर! 

आ खड़े हों.. 

छोर.. पर इस, विश्व.. के

दीखता.. हो, जग जहां..

जहां से, प्रिय... विश्व.. ये..।


एक, खिलौने.. सा, खेलता.. 

उस बिंदु पर, थोड़ा रुको! 

और ध्यान दो, 

जग चल रहा है, स्वतः कैसे!  

दुख सुख लिए.. 

तृष्णा लिए

अवसाद

भर! 

कुछ काम का, क्या है वहां ? 

तेरे लिए, 

या शांति.. ही 

यह, 

चाहिए,

और बढ़.. अपने लिए।

क्या.. शून्य सा! जग  दीखता है

सब, हो रहा है किस लिए।

वह स्वर्ण परियां, 

कनक, मुक्ता.. से सज़ी 

मन मोहती थीं, मोहतीं क्या! 

अब तुझे? 

या शांत, निर्मल झील का 

प्रिय! किनारा यह चाहिए!  

सदा ही, तुझको प्रिये! 


एक, मछली.. बन सखे 

डूबो, प्रिये!  

उस.. समंदर में, 

स्वांस.. के 

झील.. है जो, झिलमिलाती

स्वच्छ, निर्मल, मधुर रे! 

धीमे, गहरे.., और गहरे..

आनंद! कैसा मिला रे! 

वर्णन.. करो, 

मिलाओ संसार.. से

कुत्सित.. है जो, घृणित.. है

निज हाल में।


कैसा लगा, 

कुछ अलग था! 

यह शून्य था, प्रिय.. शून्य था।

शून्य का आसाद यह, 

आस्वाद यह

प्रिय! जादू भरा था। 

सच बता न! क्या जादू भरा था।

जय प्रकाश मिश्र

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