हे, नटी...! तुम.. जब संवरती..!

मित्रों! गांव जाना हुआ और किलोमीटरों फैले सीवान में और क्षितिज से उठती बावली बदली को देख मन हर्षित ऐसा हुआ की यह गीत फुट ही पड़ा। आप पढ़ें और आनंद लें।

हे, 
नटी...!  
तुम.., हो.. 
संवरती.., धुंधलके में, 
शाम.. को, जब..! ओढ.., घनपट, 
क्षितिज. ऊपर, आकाश तक 
लंबी खिंची! 
सखि...! 
घूंघट बनाए, 
बदलियों.. का, सांवली.. सी,
रश्मियां 
भी 
लजा जातीं,
छुप हैं जाती, बदलियों की ओट लेकर।

नीलिमा.. ले, अभ्रकी... तन! 
रस.. छलकता ! 
आह! कैसा..?
पोर.. से हर! 
छुल.., छुलुल.., बहता, सरसता! 
क्या... कहूं..! 
इतनी.. रमण! रमणीय.. इतनी!  
रमणी.. कोई, सच..! 
क्षीण... कटि!  
हलचल.. मचाती, 
बादलों... को.. नचाती।।। 
टंकार.. करती.., 
श्रृंगार करती...., 
बिजी हो...
बाँवंरी.. इन बदलियों का
टुप! टुप! टुपुकती.. बूंद बन बन! 
धरा के इस सुलगते तन! 


धारती 
पग..! 
तुम..., ऐ सखी!  
इस.. जमीं.. ऊपर.. 
सरस रस भर... 
प्यास से इन तृषित! तृण पर..
बरसती, 
शीतल लिए तन...!
बावरा..., मैं..  
देखता.., 
तुम्हें..., डूबता हूँ, खयालों.. में,
भीगता.. हूँ, खड़ा होकर
भीतर, 
हलक... तक! 
सच कहूं! सुधि नहिं, मोहीं.... 
मैं..! 
कहां.. हूँ, अब! 

एक होकर, झूमता, 
तेरे ही रस, रस...
विरस.. 
कैसा हो गया हूँ! रस.. तेरे, रस....।

देखता हूं, मचलते, 
तुम्हें.... 
बाली.. भरे, उस खेत में,
दाने पड़े हैं, बीच में, 
अन्नगर्भा... 
पोषणी...  तुम! 
अठखेलियां.. करती हुई, 
भागते उन! पवन संग...
है, नृत्य कैसा!  
निसर्गा!  
मधुरतम, रंजक.., मनोरम! 

झुमकती, उठती.. हुई..
उभरती, हे! पूषणी! 
लचकती.. 
प्रिय! 
बाली, उमर की, बालिका सी..
माती.. हुई, नव यौवना.. 
तुम! 
रेंड.... लेती
ऐंठती... हो.. खेत में,
अरे कैसी...? 
फसल बन बन...।

परिंदों में 
अधिक सुंदर, दीखती... हो..
साख से, उड़ती.. हुई, 
आकाश में
तुम कौन हो? 
हे, अधिष्ठात्री! मातु! अम्बे..
लहरती... 
तुम पताका सी..! 
चांदनी.. बन, 
चमकती... 
सिक्ता कणों... में,
पुलिन पर भागीरथी.. की।
क्षमा करना देवि! 
मै तो शिशु! तेरा हूँ।
मै तो शिशु! तेरा हूँ।

जय प्रकाश मिश्र


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