एक् लख पूत, सवा लख नाती तेहि घर, आज.. दिया नहि बाती।

अपने, सभी मित्रों और सुभिक्षुओं को विजया दशमी की शुभ-मंगल कामनाएं प्रेषित करता हूं।
उम्मीद करता हूं हम सब, राष्ट्र और सत्य की रक्षा के लिए इस पर्व के मुख्य किरदार सामान्य भालु बंदरों से एक रहेंगे।

हे राम! प्रभु 
आप.. आये.. अयोध्या, लौट.. कर, 
अनुज, प्रिय..! सीता.. सहित, 
कुशल.. से
यह, 
बहुत अच्छी.. बात थी।

मैं.. पूछता.. हूं, 
हे प्रभो...! 
सच्ची, बताना... 
उस समय, वह अयोध्या... 
नाथ! तुम्ह.. कैसी.. लगी!

आज तो.. 
दिन..., और.. है, 
प्रभु... "विजय" का
असुराधिपति, रावण.. हनन का,
उस दुष्ट!,  'पर-नारी-हरण' के 
ताप के, संताप में, 
दानव..., दलन... 
का।

सत्य की 
स्थापना... का, 
दूर लंका के हलक तक, 
ताड़ना.. का।

पर पूछता हूँ, स्नेह से 
आदर सहित
युद्ध क्या! 
अंतिम ही हल था।

आज मैं! उस 
युद्ध की, विभीषिका को
सोच कर.. 
घबरा... रहा हूँ! द्रवित हूँ! 
जिस युद्ध में..
एक् लख पूत, सवा लख नाती
तेहि घर, तब था.. दिया न बाती।

नाथ मुझको...
सच...
बताना.., 
उतने बड़े, सम्राट पर! 
उतने बड़े.. साम्राज्य पर! 
क्या सत्य का बल, हाथ लेकर, 
तुम लड़े थे? 
और, केवल, 
भालु, बंदर.!  हे प्रभो...
संग तुम्हारे, केवल... खड़े थे। 

कुछ नहीं, 
ऐसे...ही, प्रभु.. से पूछता हूँ, 
धृष्टता से,
मुझे सच बताना! 
हे प्रभो! 
कौन थे, वह देवता...?
रावण के वध पर... आकाश से,
जो सुमन.. वर्षण, खुश... हुए
हल्ला मचाते, कर रहे थे।

इस लिए... 
तो... कह रहा हूँ, 
सजग.. हो, जग..! 
चुप लड़ो!  शांत हो, सहायता दो
सत्य के रक्षार्थ, अरु 
अन्याय के प्रति, राष्ट्र के प्रति,
मिल सभी, समस्या तुम जहां... देखो। 

जय प्रकाश मिश्र





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