आखिर जरूरत इस जहां को मेरी क्या थी।.

मित्रों, लोगो के लिए जीवन बहुत कठिन है, इसलिए जो समर्थ हैं उनके लिए मेरी यह लाइने हैं, और उन दैव श्रापित मित्रो को समर्पित हैं जो गरीबी का दंश चुप झेलते हैं।

गुन रही हूं! सोचती... हूं!  
बहुत.. दिन, से..
एक... 'यूनिट' 
मैं.. भी हूँ, 
प्रिय..! 
इस.. जहां में, 
आखिर जरूरत इस जहां को
मेरी... क्या थी? 

जन्म.. से, मैं.., 
अभागी! 
भाग्य, स्पर्शन.. न, की... थी।
देखती.. थी, 
हर जगह.., हर रास्तों पर
क्या.. रंग! 
पुते...
ऊंचे..., घरों... में
रश्मियों सी, चमकती.., 
थिरकती...
प्रिय...! 
भाग्य लक्ष्मी... रूपसी...।
इसलिए मैं...
पूछती... 
प्रश्न पिछला...
आखिर जरूरत!  इस जहां को..
मेरी... क्या थी? 

बापू मिला, मुझे.. निराला! 
क्या.. कहूं! 
कितना सरल...
कितना सहज..
परिश्रमी....!
मां...! मेरी थी,  मूरती...
सच..! 
प्रेम... की...।

अनुजा मिलीं मुझे, प्यार करतीं,
पांच.. प्रिय!
और अग्रजा भी तीन थीं,
फिर...पूछती! हूं, 
प्रश्न पिछला...
आखिर जरूरत! 
इस जहां को.., मेरी... क्या थी? 

सच्ची कहूं!  क्या... सुनोगे...
कुछ भी, न... था,  यह..! 
कितनों के हैं, छह..
प्रिये!  बारह....
लालू को देखो.. गोविंदा को देखो..
फल.. फूलते सब...।

कमी तो, बस.. एक थी...
बेटी थी, मै.. प्रिय! 
गरीब की...
इस लिए ही ना पढ़ी, मैं ना.. लिखी।
गुण, सकल.. थे....
मुझमें प्रिये! 
मैं... 
काम, ईश्वर मानती...थी।

लाडली थी, पर रो रही हूँ! 
जिंदगी भर
इसलिए, 
हूं.. पूछती....! प्रश्न पिछला...
आखिर जरूरत! 
इस जहां को.., मेरी... क्या थी? 

जय प्रकाश मिश्र

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