एक "कुत्ता".... 'महात्मा' क्यों कर.. नहीं है,
मित्रों, आप पढ़ें और आनंद लें। कुछ अनावश्यक कुंठाए हमारे भीतर रच जाती हैं, हम रूढ़ियां पाल लेते हैं। जीवन भर उसमें उलझे रहते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए, हमेशा रूप से बड़ा गुण होता है इसी पर कुछ पंक्तियां आपके लिए।
एक "कुत्ता"....
'महात्मा' क्यों कर.. नहीं है,
यही... तो है, खोजना,
अन्यथा..
फिर, क्या.. छुपा... इन
मंदिरों.... में!
किसी, भक्त जन से...,
अकेले में, बूझना...,
पूछना....
कोइ, गुर... मिले तो बताना..
मैं चाहता हूँ जानना,
बस, एक "कुत्ता"....
'महात्मा' क्यों कर.. नहीं है।
भाव: जीव, जीव है। किसी भी योनि, जाति, धर्म, देश, स्थिति में पैदा हो इससे क्या! महत्व पूर्ण है कि उसकी वर्तमान स्थिति, भाव, विचार क्या हैं। यदि कोई भक्त होगा तो वह एक कुत्ते में और महात्मा में मात्र रूप आदि सांसारिक कारण से भेद नहीं करेगा। लेकिन समाज में ऐसा नहीं, हम कुंठा पाले हुए जीते हैं।
बैठ कर,
फिर.. सोचना! बहुत गहरे!
अंतर भी क्या है
जीव हैं सब, एक ही...
यह... 'नहीं' यह..., वह.. नहीं, वह...
चक्कर, ये... क्या.. है?
कुत्ता, ये.. क्या... है,
आदमी क्या..!
समस्या...
आखिर कहां है,
कुछ नहीं है,
डॉग कह दो, घर में रख लो, प्यार कर,
मुख..., मुख पे रख दो..
क्या यही, हैं.. हम?
विचार है,
यह... 'बुध' नहीं.. है।
कुछ नहीं, कोई.... यहां..
कुत्ता नहीं, क्यों..? बुध..यहां!
चिपकन.. है सारी,
बुद्धि.. की,
कुंठा... हृदय की
भ्रम.. भरी, दुनियां.. पड़ी है।
हम दुविधा भरी दुनियां में रहते हैं, स्वच्छ तथ्य और तर्क पर टिकते नहीं, डॉग को सम्मान और कुत्ते को दुत्कार! एक घर में आसन जमाएगा एक सड़कों पर भूखा मरेगा, एक का मुंह चूम लेंगे एक को डंडे से स्वागत! क्या है ये सब!
क्या! आप... ने
विस्मय!
सुना..... है?
हुआ भी है, आपको!
यह, आज तक!
क्या? हुआ था, सोचना!
वहीं तो यह गेट.. था,
जिसको हमे था
खोलना...
जन्म में इस...
खुल गया है, अगर प्यारे!
बंद इसको नहीं करना...।
लक्ष्य है यह, प्राप्ति है, समर्पण है
आत्म का, उस... आत्म में,
दीखता, जो मित्र कुछ को,
जन्म भर, बिल्कुल...
नहीं... है।
एक शब्द है विस्मय! यानी अपनी क्षमता, और विश्वास की सीमा से बाहर, एक तरह उसके आगे समर्पण। पूर्ण समर्पण और आत्मविस्मृति एक मोड है, अनंत से योग का द्वार है। इससे मिलना नित्य ही समाधि का आनंद है।
एक प्रश्न है,
यह, अनुत्तरित.. है,
समय की पद.. चाप से,
यह...! बेखबर है..,
आज तक,
"कर्म का सिद्धांत क्या सबके लिए है "
कर्म से जो मुक्त है, बुद्ध है, शांत है,
प्रशांति में हैं!
युग युगों से,
वो अलग क्या! कर्म से..
क्या प्रिये! इन बंधनों से?
भटकन.. तो है,
इसे, सोचने... में!
पर कौन है यह, "बुद्ध... शांता.. मैत्रेय."
आबुस!
क्या अलग है, आदमी से,
हम सभी से,
किसने दिया है, छूट इनको...
कर्म के सिद्धांत से,
किसका दिया सिद्धांत है ये,
वह, एक.. ही, है,
इन सभी के, हम सभी के, बीच.. में।
भाव: कुछ लोग ऊपर पहुंच कर, पद, गरिमा, गौरव के चलते सामान्य व्यवहार छोड़ देते हैं। आम जन को दुत्कारते है, या आदमी ही नहीं समझते। उन्हें याद रखना चाहिए मनुष्य कोइ भी हो, नीचे ऊंचे उसे मनुष्य की गरिमा मिलनी ही चाहिए। कर्म सिद्धांत सब पर एक सा ही व्यवहृत होता है।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment