किसी रिमझिमी सावन.. के जैसा।

मित्रों, जीवन आप की प्रेजेंस मात्र है, सत्य कैसा! आप ने संसार देखा और कुछ ने आपका व्यवहार देखा। इसी पर कुछ लाइने आप पढ़ आनंद लें।
शनिवार: २४ अक्टूबर २५

जब, कभी मैं.. सामने, 
होता.. हूँ, अपने! 
आज! 
वैसे.. ही, खड़ा हूँ, 
अपने!  मित्रों! 

दर्पण.. हूँ!  मैं.., अब स्वच्छ!  
निर्मल.. साफ 
बिल्कुल..
इसलिए, अब दृष्टि से  
मैं.. हट रहा हूँ , शून्य जैसा..।

छाया रहित, प्रतिबिंब.. 
सबका
हो.. रहा हूं!  
अब प्रिये! कुछ भी नहीं मैं! 
राग रंग, संसार जैसा।

अब.. 
एक... 
माध्यम.., 
मात्र हूँ!  मैं....
इस, जगत में, दूर सबसे! 
प्रतिबिंब..! सबका, छप.. रहा,
प्रिय! देख मुझ में,
अहा! कैसा...
निस्पृह, निरालस मैं..खड़ा,
हूं, प्रिये! सबसे..।

आदमी! एक.. मैं भी हूँ , 
हर किसी सा, 
प्रतिबिंब.. 
निज... का, देखता हूँ! 
उस ही, तरह ही, दौड़ता.. हूँ 
कभी दुखी हूं, 
कभी सुखी हूँ, 
कभी भरम में हूं, भरमता।

पर.., इसके भीतर, मैं.. छुपा हूँ! 
देखता, सच! हंस रहा हूँ।
साथ 
मेरे, अकर्ता, 
मेरा, खड़ा है, देखता हूँ! 
दर्पण वही है, मैं लिफाफा मात्र उसका
बस मैटेरियल... हूँ.. ग्लास सा..!

पास से उसे छू रहा हूँ! शांत कितना! 
धीर कितना! स्थिर है, कितना.. 
क्या कहूं? निरलस है, कितना
चिपकता, यह संग से,
संमबंध से, स्वार्थ से
शरीर से,
बिल्कुल नहीं है, 
एक झरना, एक.. सा
रस.. सरस ले, बहता.. सदा।

मैं फलक बन कर 
तन.. रहा हूँ! 
उपस्थित हूँ, खिल रहा हूँ..
भीतर ही अपने.. घुल रहा हूँ।

कारण था मैं, 
विचार एक,
पाला हुआ, सहेजा.. 
इतने जतन, इतने दिनों से,
रसाता मै घुल रहा हूँ! 

अपने ही भीतर
मिट.. रहा हूँ, कौन था मैं..! 
कारण था प्रिय! 
हर समस्या का
अब.., हट रहा हूं।

कारण नहीं होता है जब
सहज सब.. होता है तब
स्वभाव में, घटता है सब 
आसान कैसा, 
सच.. प्रिये! सच.. प्रिये! 
बरसते.. उस..
रिमझिमी सावन.. के जैसा।

कर्ता नहीं, जब.. 
एक भी होता, प्रिये!  
सच है ये, 
वास्तविक.. वह, सत्य भी.. 
घटता प्रिये! 
मैं नहीं, 
बस एक् फलक, 
उठता हुआ, गिरता हुआ, 
संग तेरे था प्रिये! नेपथ्य सा।
जय प्रकाश मिश्र

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