तुम! कब मिलोगी!

मित्रों, वर्षा बाहर बरसती है, पर लोगों के अंतर में हर्ष भर देती है, एक अजीब सी छुअन सबके उर में स्पंद बन तैर जाती है। इसी पर कुछ लाइने आपके लिए।

ये... मधुर.., बरखा.. 

प्रिये! 

और.. तुम! 

एक होकर, कब... मिलोगी,

पूछता.. हूँ! 

बूंद.. गिरती, फैलती.., 

एकसार.. होती

आकृति, तेरी... बनाती, अंतरों... में,

विहंसती...,  मुकुलित.. प्रिये! 

रुनझुनी स्वर.., पांव.. में 

प्रिय! 

बजाती...

तुम! कब मिलोगी! 


चुप खड़ी हैं, डालियां! देख ना!  

ये.. पत्तियां! 

आगोश.. में भर, अंधेरों... को! 

टपक.., अनुभव कर रहीं हैं,

बूंद.. की, 

सरकती.. जो आ रही है

शिखर... से,

संधि की इस धुंधल बेला में प्रिये!  

खनकते.., कंगन लिए,

तुम! कब मिलोगी! 


कौन...?  

आया है उधर, 

मणिबंध बांधे... मुकुल मन, 

हिंगोल करता, झिगोला इतना ढीला 

तन पे पहने, 

स्फुरित.... तन

बिहंसता है, मालती के फूल सा यह! 

नागचंपा सा धवल, प्रिय! 

कौन है यह? 

भ्रमर.. के संग, मुक्त.. मन, 

उन्मुक्त तन।

आ... मिलो, एक बार... फिर..

पावस.. की रातों में, 

प्रिये!  

बरसती..., इन.. झिलमिली..

बूंदों.. के संग.. 

छोड़ सारे राज रंग..., 

प्रसाधन!  

निज रूप में,  उड़ चले हम...

मुक्त इस नीले.. गगन में।

आ चलें हम, मुक्त.. इस, नीले.. गगन में।

जय प्रकाश मिश्र


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