देखा है, उसको हंसते मैने नील.. गगन में।
मित्रों, प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य में परमात्मा की झलक कभी कभी जब हम पूर्ण चैतन्य हों तो मिल भी सकती है। उसकी एक हल्की सी मुस्कान इसमें हम पा सकते हैं। इसी पर छोटी सी आ-रंजिका आप के लिए।
देखा है, उसको... हंसते...मैने..,
नील.. गगन में,
सच! प्रिय,
गहरे..!
मुसुकाते..! अधरों में
छुप.. के, धीमे.... धीमे..।
ओट.. लिए,
उजली.. बदली की,
बादल... के संग.. नर्तन करती..
मचल.. रही थी,
झर...
जाती.. थीं,
बूंदे... उसकी.. निवि से नीचे...।
अध-खिले,
पुष्प.. पादप.., पर गिरते
किसलय.. उर
सहलाते..,
नव-कली.. भिगोते...
शीतल होठों. से
मां.. के होठ, छुए.. हों जैसे..।
कितनी, प्रिय!
वह..! लगती.. थी,
सच! मोती... सी ही..
चंपक वर्णी.., हीरक.. कण सी।
हिल. उठती थी,
कोमल... किसलय! दुलक दुलक़ती,
पिय! हिय..., हिलता,
मेरा.. जैसे।
सौरभ मिल जाता
बूंदों... में...
मादकता, बह.... उठती थी,
कैसे...! उनको...
नग्न.. दिशाएं,...
आतुर... हो,
सच..!
अंगों... में, रख.. लेतीं थीं।
खिल उठता था, तन मन मेरा
प्रिये! राग.. रंग..
खिलता..., धुलता...,
बहता विमल.. कली के, ऊपर..
छुर.. छुर.. करता, छुल.. छुल.. करता।
मन मेरा इन सबमें डूबा...
डूब गया,
प्रिय आनंदघन में।
डूब गया, प्रिय आनंदघन में।
पग दो:
मत.. बांधो,
ये.. डोर, मुझे..., मैं.. मुक्त पवन हूं!
बंधन.. मुझको, भारी... है,
प्रिय!
नहीं सुहाता, हिय! को मेरे।
मत.. बांधो, ये.. डोर, मुझे...।
मत पोतो रंगों को मुझपर,
तुम, इतना..
प्रिय,
मैं.. स्वच्छ.. धवल.. हूँ..
छुप.. जाएगी, आभा.. मेरी
रंगों... में इन,
छुओ..
मुझे अनछुई नजर के नयनों से तुम!
मत पोतो रंगों को मुझपर
मैं बिमल धवल हूँ।
जय प्रकाश मिश्र
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